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________________ 215 13. मानववर्धन ये खरतरगच्छीय महिमासागर के शिष्य थे। इनकी सं. 1702 से 1726 तक की रचनायें प्राप्त है। इनमें से कुछ हिन्दी रचनायें उल्लेखनीय हैं। जैन समाज में भक्तामर और कल्याणमन्दिर दो स्तोत्र अत्यन्त प्रसिद्ध हैं, इनका आपने हिन्दी पद्यानुवाद किया है। भक्तामर पद्य का एक उदाहरण प्रस्तुत है: प्रणमत भगत अमर वर सिर पुर, अमित मुकुट मनि ज्योति के जगावना, हरत सकल पाप रूप अंधकार दल, करत उद्योत जगि त्रिभुव न पावनां। इसे आदिनाथ जकेचरन कमल जग, सूवधि प्रणमि करि कछ भावनां, भवजल परत लरत जन उधरत, जुगादि मानन्द कर सुन्दर सुहावनां। 1। 14. महिमसमुद्र (जिन-समुद्रसूरि) ये खरतरगच्छ की बेगड शाखा के प्राचार्य जिनचन्द्रसूरि के शिष्य थे। ये भी राजस्थानी और अच्छे कवि थे। इनके सम्बन्ध में राजस्थानी (निबन्ध-माला) भाग 2 में लेख प्रकाशित हो चुका है। हिन्दी भाषा में भी आपने कई उल्लेखनीय रचनायें की हैं जिनमें से भर्त हरि "वैराग्य शतक"पर 'सर्वार्थसिद्धि मणिमाला" नामक विस्तृत टीका है। इसकी रचना सं. 1740 में हई हैं। स्वतंत्र उल्लेखनीय कृतियों में 'तत्वप्रबोध नाटक सं. 1730 जैसलमेर में रचित है। इसकी तत्कालीन लिखित प्रति प्राप्त है। अन्य रचनाओं में "नेमिनाथ बारहमासा" "नारी गजल" “वैद्यचिन्तामणि" (समुद्रप्रकाश सिद्धान्त) आदि स्फुट कृतियें भी प्राप्त हैं। वैद्य चिन्तामणि की अभी तक पूर्ण प्रति प्राप्त नहीं हुई है। 18 वीं शताब्दी के गद्य के नमूने के रूप में वैराग्य शतक टीका का अंश उद्धृत है: "अब श्री वराग्यशतक के विष तृतीय प्रकाश बखान्यौ तो अब अनंतरि चोथा प्रकाश गुवालेरी भाषा करि बखानता हूं। प्रथम शास्त्रोक्त षडभाषा छोडि करि या अपभ्रंश भाषा वीचि ऐसा ग्रंथ की टीका करणी परीसु कौन वास्ता ताका भेद बतावता है जु उर भाषा षट है ताका नाम कहता है।" 15. लक्ष्मीवल्लभ ये खरतरगच्छीय क्षेमकीर्ति शाखा के लक्ष्मीकीर्ति के शिष्य थे। इनका मूल नाम "हेमराज" और उपनाम "राजकवि" था। संस्कृत, राजस्थानी और हिन्दी तीनों भाषाओं में इन्होंने काफी रचनाय की है। हिन्दी रचनाओं में वैद्यक सम्बन्धी दो रचनायें हैं:-1. मन परीक्षा, पद्य 36 और 2. काल ज्ञान, पद्य 178, सं. 1741 में रचित । इनकी दूहा बावनी,दहा 58;हेमराज बावनी, सवैया 573; चौवीसी स्तवन ; नवतत्व भाषा बन्ध, पद्य 82, सं. 17473;भावना विलास, पद्य 52, सं. 1727%; नेमि राजुल बारहमासा आदि हिन्दी की अन्य रचनायें भी प्राप्त है। इनमें से भावना विलास का प्रथम पद्य उदाहरण के रूप में प्रस्तुत है: प्रणमी चरण युग पास जिनराज जू के, विध्न के चूरण हैं पूरण हैं पास के । दृढ दिल मांझि ध्यान धरि श्रुतदेवता को, सेवत संपूरन हो मनोरथ दास के । ज्ञान दृग दाता गुरु बड़ी उपगारी मेरे, दिनकर जैसे दीपे ज्ञान प्रकाश के । इनके प्रसाद कविराज सदा सुख काज, सवीये बनावति भावना विलास के ।1।
SR No.003178
Book TitleRajasthan ka Jain Sahitya
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVinaysagar
PublisherDevendraraj Mehta
Publication Year1977
Total Pages550
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size22 MB
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