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________________ 125 आध्यात्मिक पूजन-विधान संग्रह पौष कृष्ण एकादशी, जन्मे श्री जगदीश। इन्द्रादिक उत्सव कियो, नह्वन कियो गिरिशीश॥ ॐ ह्रीं पौषकृष्णैकादश्यां जन्ममंगलमंडिताय श्रीचन्द्रप्रभजिनेन्द्राय अयं नि. स्वाहा। भव-तन-भोगविरक्त हो, जिनदीक्षा अविकार। धरी पौष वदि ग्यारसी, पूजों करि जयकार। ॐ ह्रीं पौषकृष्णैकादश्यां तपोमंगलमंडिताय श्रीचन्द्रप्रभजिनेन्द्राय अयं नि. स्वाहा । फाल्गुन श्यामा सप्तमी, प्रगट्यो केवलज्ञान । आतम महिमा मुक्तिपथ, दर्शायो भगवान ।। ॐ ह्रीं फाल्गुनकृष्णसप्तम्यांज्ञानमंगलमंडिताय श्रीचन्द्रप्रभजिनेन्द्राय अयं नि. स्वाहा । सित फाल्गुन सप्तमि गये, मुक्तिमाँहिं परमेश। पूजत पाप विनष्ट हों, धन्य-धन्य सर्वेश ।। ॐ ह्रींफाल्गुनशुक्लासप्तम्यांमोक्षमंगलमंडिताय श्रीचन्द्रप्रभजिनेन्द्राय अयं नि. स्वाहा। जयमाला (सोरठा) जयवन्तो शिवभूप, अचिन्त्य महिमा के धनी। परमानन्द स्वरूप, गाऊँ जयमाला प्रभो।। (तर्ज- हे दीनबन्धु...) हे चन्द्रप्रभ जिनेन्द्र ! सत्य शरण हो तुम्हीं। हे वीतराग देव ! तारण-तरण हो तुम्हीं॥ कर दर्श नाथ सहज ही कृतकृत्य हो गया। प्रभु ! स्वयं स्वयं में ही सहज तृप्त हो गया। विभु ! तेजपुंज आत्मा को आप जानके। होकर उदास लोक से दीक्षा सु-धार के॥ ध्यानाग्नि में चहुँ घाति कर्म सहज जलाए। अनन्त दर्श-ज्ञान-सुख-वीर्य तब पाए ।। अष्टम हुए तीर्थेश धर्मतीर्थ बताया। ध्रुव तीर्थरूप आत्मा प्रत्यक्ष दिखाया। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003170
Book TitleAdhyatmik Poojan Vidhan Sangraha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRavindra
PublisherKanjiswami Smarak Trust Devlali
Publication Year2008
Total Pages242
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Worship, Religion, Ritual, & Vidhi
File Size8 MB
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