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________________ ( ७८) और भी देखिए चौदह से चुम्मालीस ग्रन्थ के कर्त्ता श्रीमदूहरिभद्रसूरि महाराज अपने बनाए हुवे सातवे पंचाशक में लिखते हैं कि" दव्वे भावे य तहा सुद्धा भूमी पएसकीलाय । दव्वे पत्तिगरहिया, अन्नेसिं होइ भावेउ || १० ॥ ' इस गाथाकी टीकामें श्री अभयदेवसूरि महाराज फरमाते हैं कि ' द्रव्ये द्रव्यमाश्रित्य भावे भावमाश्रित्य चशब्दः समुच्चये । तथाऽनेन वक्ष्यमाणप्रकारेण विशिष्टप्रदेशादिलक्षणेन किमित्याहशुद्धा भूमिर्निर्दोषा जिनभवनोचितभू द्विविधा भवति तत्राद्या तात्रदाह-प्रेदेशे विशिष्टजनोचितभूभागे । तथाऽकीला च शङ्करहिता । उपलक्षणत्वादस्थ्यादि शल्यरहिता च । द्रव्ये द्रव्यतः शुद्धा भूमि भवतीति प्रकृतं । अथ द्वितीयमाह अत्रीतिकरहिताऽप्रीतिवर्जिता ! इहाऽप्रीतिकशब्दस्य अन्येषामित्येतत् सापेक्षस्याऽपि समासः तदा दर्शनादिति । अन्येषां परेषां । भवति वर्तते । भावे तु भावतः पुनः शुद्धा भूमिरिति प्रस्तुतमेवेति गाथार्थः ॥ १० ॥ ७ --- तात्पर्यार्थ - द्रव्य तथा भावते शुद्ध जनीनमें जिनमंदिर बनवाना | द्रव्य शुद्धभूमि जहां पर श्रेष्ठ मनुष्य निवास करने हों वहां पर जिनभवन बनाना, यह द्रव्यसे शुद्ध भूमि है । इत्यादि । इससे साबित होता है कि आगमशास्त्रकी रीतिसे हमेशा से शहर में मंदिर बनते आए हैं । यह कोई नया रीवाज नहीं. बारहवीं गाथामें भी श्रीहरिभद्रसूरि महाराज फरमाते हैं कि - ' जहां वेश्याका पाड़ा Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003135
Book TitleDevdravyadisiddhi Aparnam Bechar Hitshiksha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSarupchand Dolatram Shah, Ambalal Jethalal Shah
PublisherSha Sarupchand Dolatram Mansa
Publication Year
Total Pages176
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Devdravya
File Size7 MB
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