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________________ ७० समाज-व्यवस्था के सूत्र दुकान में जमा कर दूं। पूरी दुकान को रुपयों से भरा देखना चाहता हूँ और कुछ नहीं चाहता।' तीसरे से पूछा- 'तुम क्या चाहते हो ?' तीसरा चोर था। उसने कहा- 'हुजूर ! मैं तो और कछ नहीं चाहता। इन दोनों का सही-सही पता बता दीजिएगा।' चोर का नाम सुनते ही दोनों घबरा गए और बोले-'अव हम वहाँ जाकर भी क्या करेंगे ?' समाज में विश्वास चाहिए। समाज का एक आधार बनता है विश्वास । विश्वास के बिना समाज चल नहीं सकता। अचौर्य आर सत्य-ये दोनों अणुव्रत विश्वास उत्पन्न करने वाले हैं। ब्रह्मचर्य विश्वास पैदा करता है। किसी महिला का आपरेशन हो रहा था। महिला ने डॉक्टर से कहा-'डॉक्टर ! नर्स को भी यहाँ बुला लो।' डॉक्टर ने कहा- 'क्या तुम्हें मुझ पर विश्वास नहीं है।' महिला बोली- 'मुझे तो विश्वास है, पर मरे पति को मुझ पर विश्वास नहीं है, इसीलिए नर्स को बुला लो।' ब्रह्मचर्य भी बहुत विश्वास पैदा करने वाला है। जिसके इन्द्रिय-संयम होता है उसका समाज में विश्वास होता है यह नहीं होता तो कोई उसका भरोसा नहीं करता। ये तीन ब्रह्मचर्य, सत्यनिष्ठा और अचौर्य-ये समाज के लिए आधारभूत बनते हैं अपनी विश्वसनीयता के कारण। एक और महत्त्वपूर्ण बात हे परिग्रह की सम्यग् व्यवस्था। जहाँ समाज में परिग्रह का सन्तुलन होता है, वहत ऊँचाई और नीचाई होती है, वहाँ व्यवस्था गड़वड़ा जाती है। यह कोई साम्यवाद का सूत्र नहीं है। परिग्रह का उत्पादन और वितरण का सन्तुलन करना यह बहुत प्राचीन व्यवस्था रही है। एक आदमी इतना अपने अधिकार में ले लेना चाहता है जितना नहीं लेना चाहिए, जिससे समाज में क्रूरता फैल जाए ! यह चिन्तन हजारों-हजारों वर्ष पुराना रहा है। यह श्रावक की आचार-संहिता का पाँचवाँ व्रत है-इच्छा का परिमाण, इच्छा का संयम करना, उसे सीमित करना, जो व्यक्ति अपनी इच्छा पर अपना नियन्त्रण नहीं करता वह समाज के लिए खतरनाक बन जाता है। हमारी इस पृथ्वी पर ४-५ अरब आदमी रहते हैं। उसमें ५ अरव आदमियों का पेट भरने की क्षमता तो है पर एक आदमी की इच्छा को भरने की क्षमता उसमें नहीं है। कितना बड़ा आश्चर्य है ! जो अरबों व्यक्तियों का पेट भर सकती है किन्तु एक व्यक्ति का पेट नहीं भर सकती। उस स्थिति में यह सूत्र बहुत महत्त्वपूर्ण बन जाता है कि इच्छा का संयम न करना, उसे नियन्त्रित करना, उसका परिमाण करना। ये पाँच अणुव्रत समाज के लिए आधारभूत बनते हैं। जिस समाज में ये स्थायी नहीं होते वह समाज विकासशील समाज नहीं हो सकता। भगवान् महावीर Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003110
Book TitleSamaj Vyavastha ke Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMahapragna Acharya
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year2009
Total Pages98
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Spiritual
File Size5 MB
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