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________________ अपने अमूल्य प्राणों का बलिदान हंसते-हंसते दे डाला, उसी पिता का पुत्र रूपवती नारी के मायाजाल में फंसकर जलक्रीड़ा में मग्न हो रहा है । शकडाल की आत्मा कितनी वेदना से निकली होगी ? जो अभागे ! शकडाल ने तेरे से कितनी आशाएं रखी थीं ? स्थूलभद्र के आंसू जलकर राख हो गए। जिसके प्राणों में चिता जलने लगती है, वह रो नहीं पाता । श्रीयक ने बड़े भाई स्थूलभद्र को देखा। उसने सोचा, यदि स्थूलभद्र नहीं रोएंगे तो पागल हो जाएंगे। वह उनके पास आया और बोला- 'तुम घर पर होते तो पिताजी को समझा देते ।' स्थूलभद्र मौन था। श्रीयक ने कहा- 'भाई ! तुम मौन क्यों हो ? क्या हो गया है तुम्हें ? सम्राट् रो रहे हैं.... पाटलीपुत्र रो रहा है.... असंख्य नर-नारी रो रहे हैं और तुम....तुम....?' स्थूलभद्र बोला- 'श्रीयक! मैं भी रो रहा हूं.... अपने ही दुर्भाग्य पर, अपने ही विलास पर.... अपनी ही दुर्बलता पर ।' स्थूलभद्र ने श्रीयक की ओर देखा । श्रीयक अब भी रो रहा था। २०३ Jain Education International आर्य स्थूलभद्र और कोशा For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003105
Book TitleArya Sthulabhadra aur Kosha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMohanlal C Dhami, Dulahrajmuni
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year2010
Total Pages306
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & History
File Size10 MB
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