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________________ सामायिक और इन्द्रिय संवर मैंने अपने मित्र से कहा-तुम तटस्थ नहीं हो । उसे बहुत बुरा लगा | किसी आदमी को कहा जाए कि तुम तटस्थ नहीं हो, पक्षपाती हो तो उसे बहुत बुरा लगता है । प्रत्येक व्यक्ति अपने आपको तटस्थ प्रमाणित करना चाहता है । कोई नहीं चाहता कि लोग उसे पक्षपाती समझे । यह लांछन उसे स्वीकार्य नहीं है | पक्षपात करने वाला भी पक्षपाती कहलाना नहीं चाहता । वह इसे सहन नहीं कर सकता | मित्र ने मुझसे पूछा-'यह कैसे कहा कि मैं तटस्थ नहीं हूं । मैं हर बात में तटस्थता बरतता हूं । किसी के साथ पक्षपात नहीं करता । फिर मुझ पर यह आरोप क्यों ?' मित्र का कहना भी उचित था । प्रत्येक व्यक्ति इसी आधार पर अपना औचित्य स्थापित करता है । मैंने कहा- बहुत बार ऐसा होता है कि प्रकाश के नीचे अंधकार छिपा रह जाता है | ‘दीपक तले अंधेरा'-यह प्रसिद्ध कहावत है। अपनी पहचान हम स्वयं खोजें, क्या हमारे प्रकाश के नीचे कहीं अन्धकार तो नहीं छिपा है । दूसरों को जानना, दूसरों को पहचानना बहुत सरल है । अपने आपको जानना, अपने आपको पहचानना सबसे कठिन कार्य है । दूसरों के विषय में हमारी धारणाएं बहुत निश्चित होती हैं । स्वयं के बारे में अपनी धारणा एकपक्षीय होती है । हर बात में यह तर्क होता है, मैं अच्छा हूं, मैं कोई भूल नहीं करता, मैं तुम्हारे जैसा नहीं हूं, जो दूसरों की बात में आ जाऊं या ऐसा कहूं, यह तर्क सबके सामने प्रखर रूप से रहता है। उसे अपनी दुर्बलता को स्वीकार करना मान्य नहीं होता । हजारों में ऐसा व्यक्ति विरल ही मिलेगा, Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003047
Book TitleSamayik
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMahapragna Acharya
PublisherAdarsh Sahitya Sangh
Publication Year
Total Pages198
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Spiritual
File Size8 MB
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