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________________ १९८ जैनदर्शन असत् ज्ञान और दर्शन ( क्षयोपशम के बलानुसार ) प्रकट होते हैं । इन दोनों देशघाती प्रकृतियों के क्षयोपशम के समय का । उपर्युक्त मिथ्यात्वादि सर्वघाती प्रकृतियों के क्षयोपशम के समय जो उपशम होता है वह उस कर्म के विपाकोदय के निरोधरूप होता है । अर्थात् सत्तागत इन कर्मों को इतना दुर्बल बना दिया जाता है कि स्वरूपतः अर्थात् अपना असली शक्ति के अनुसार फल न दे सके ऐसा वह उपशम होता है। कहने का अभिप्राय यह है कि ऐसे क्षयोपशम में उस कर्म का प्रदेशोदय ही होता है, विपाकोदय नहीं । अर्थात् इन सर्वघाती कर्मप्रकृतियों का क्षयोपशम तभी शक्य है जब उसमें प्रदेशोदय ही हो । परन्तु मतिज्ञानावरण आदि देशघाती कर्मप्रकृतियों का क्षयोपशम ऐसा होता है कि उसमें इन कर्मों के मन्दरसयुक्त अमुक दलिकों का विपाकोदय भी साथ ही होता है, फिर भी विपाकोदयवाले कर्मदलिक अल्परसयुक्त होने के कारण स्वाघात्य गुणों का घात नहीं कर सकते । विपाकोदयप्राप्त कर्मदलिकों की रसशक्ति जितनी मन्द होती है उसके प्रमाण में मतिज्ञानादि गुणों का आविर्भाव होता है । जीव में अनादिकाल से रहे हुए मति, श्रुत आदि के आवरणभूत कर्मों का क्षयोपशम भी अनादि काल से बहता हुआ चला आ रहा है । और उसमें उन देशघाती कर्मों के देशघाती रस का ही उदय हो सकता है, न कि सर्वघाती रस का उदय; क्योंकि देशघाती कर्म के विपाकोदय से मिश्रित क्षयोपशम के समय उस कर्म का सर्वघातिरसयुक्त कोई भी दलिक उदयमान नहीं होता । परन्तु चक्षुर्दर्शनावरण, अवधिज्ञानावरण, जैसे आवरण जब तक सर्वघाती रस से उदयमान होते हैं तब तक उनका क्षयोपशम नहीं हो सकता तथा उनसे आवृत गुण भी प्रकट नहीं हो सकते । परन्तु जब इन आवरणों का सर्वघाती रस देशघाती रस बन जाता है तब इन कर्मों का क्षयोपशम होता है । परन्तु ऊपर कहा उस तरह, देशघाती कर्मों का क्षयोपशम उन कर्मों के देशघातिरसयुक्त दलिकों के विपाकोदय से मिश्रित ही होते हैं, किन्तु विपाकोदय प्राप्त दलिक अल्प रसवाले होने से स्वघात्य गुणों का घात नहीं कर सकते । क्षयोपशम शब्द में आए हुए उपशम शब्द का जो अर्थ हमने देखा उसकी अपेक्षा औपशमिक के उपशम का अर्थ अधिक विशाल है, अर्थात् क्षयोपशम के उपशम का अर्थ है विपाकोदयसम्बन्धी योग्यता का अभाव अथवा तीव्र रस का मन्द रस में परिणमन अर्थात् मन्दविपाकोदय । परन्तु औपशमिक के उपशम का अर्थ है प्रदेशोदय और विपाकोदय दोनों का ( उदयमात्र का) अभाव; क्योंकि क्षयोपशम में कर्म का क्षय जारी रहता है जो कम से कम, प्रदेशोदय के सिवाय बन ही नहीं सकता । परन्तु उपशम में यह बात नहीं है । जिस समय से कर्म का उपशम होता है उस समय से ही उसका क्षय उतने काल के लिये रुक जाता है । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002971
Book TitleJain Darshan
Original Sutra AuthorNyayavijay
Author
PublisherShardaben Chimanbhai Educational Research Centre
Publication Year2003
Total Pages458
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size17 MB
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