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________________ २०१] सप्तदश अध्ययन सचित्र उत्तराध्ययन सूत्र तर Who sleeps with dusty-dirty feet does not carefully inspect his couch and careless about his bed; he is called a sinful sge. (14) दुद्ध-दहीविगईओ, आहारेइ अभिक्खणं। अरए य तवोकम्मे, पावसमणे त्ति वुच्चई ॥१५॥ जो दूध-दही आदि विकारवर्द्धक पदार्थों का बार-बार आहार करता है और तपश्चर्या में अरुचि रखता है, वह पाप-श्रमण कहलाता है ॥१५॥ Who eats milk, curd and other exciting eatables frequently and has no inclination towards penances, he is called a sinful sage. (15) अत्यन्तम्मि य सूरम्मि, आहारेइ अभिक्खणं । चोइओ पडिचोएइ, पावसमणे त्ति वुच्चई ॥१६॥ जो सूर्योदय से सूर्यास्त तक-दिन भर बार-बार आहार करता है, गुरु के समझाने पर उल्टा उन्हें ही उपदेश देने लगता है, वह पाप-श्रमण कहा जाता है ॥१६॥ Who eats frequently (many time) from sun-rise to sun-set, and when admonished by teacher, makes an angry reply, he is called a sinful sage. (16) आयरियपरिच्चाई, परपासण्डसेवए । गाणंगणिए दुब्भूए, पावसमणे त्ति वुच्चई ॥१७॥ जो अपने आचार्य को छोड़कर दूसरे धर्म-सम्प्रदायों मत-परम्पराओं को स्वीकार कर लेता है। छह महीने की अल्प अवधि में ही एक गण से दूसरे गण में चला जाता है, वह दुर्भूत-निन्दनीय पाप-श्रमण कहलाता है ||१७|| Who leaves his own preceptor and accepts other heretic-creed-traditions, in the short period of six months goes from one gana to other gana (the collection of pupils of one preacher) such bad ascetic, is called sinful sage. (17) ___ सयं गेहं परिचज्ज, परगेहंसि वावडे । निमित्तेण य ववहरई, पावसमणे त्ति वुच्चई ॥१८॥ जो अपने घर को छोड़कर (प्रव्रजित होता है) दूसरे के घर के गृहकार्यों में लग जाता है; निमित्तशुभाशुभ बताकर व्यवहार करता है, वह पापश्रमण कहलाता है ॥१८॥ Who leaving his own house (becomes consecrated) and busies himself another's house work, lives by foretelling fortunes, he is called a sinful sage. (18) सन्नाइपिण्डं जेमेइ, नेच्छई सामुदाणियं । गिहिनिसेज्जं च वाहेइ, पावसमणे त्ति वुच्चई ॥१९॥ जो अपने ज्ञाति जनों-पूर्व परिचितों से आहार प्राप्त करना चाहता है, सामुदानिक-अनेक घरों से भिक्षा नहीं लेना चाहता तथा गृहस्थ की शैया, आसन आदि पर बैठ जाता है, वह पाप-श्रमण कहा जाता है |॥१९॥ For Private & Personal Use Only wwhealhelibrary.org Jain Education International
SR No.002912
Book TitleAgam 30 Mool 03 Uttaradhyayana Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmarmuni, Shreechand Surana
PublisherAtmagyan Pith
Publication Year
Total Pages652
LanguageHindi, English
ClassificationBook_Devnagari, Book_English, Agam, Canon, Conduct, & agam_uttaradhyayan
File Size21 MB
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