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________________ ९. [प्र. ] से किं तं बंधणपच्चइए ? ऊ [उ.] बंधणपच्चइए, जं णं परमाणुपुग्गला दुपएसिय-तिपएसिय-जाव-दसपएसिय संखेज्जपएसिय-असंखेज्जपएसिय-अणंतपएसियाणं खंधाणं वेमायनिद्धयाए वेमायलुक्खयाए वेमायनिद्धॐ लुक्खयाए बंधणपच्चइएणं बंधे समुप्पज्जइ जहन्नेणं एक्कं समयं, उक्कोसेणं असंखेज्जं कालं। से तं +बंधणपच्चइए। ॐ ९. [प्र. ] भगवन् ! बन्धन प्रत्ययिक सादि-वित्रसाबन्ध किसे कहते हैं ? [उ. ] गौतम ! परमाणु, द्विप्रदेशिक, त्रिप्रदेशिक, यावत् दशप्रदेशिक, संख्यातप्रदेशिक, ऊ असंख्यातप्रदेशिक और अनन्तप्रदेशिक पुद्गल-स्कन्धों का विमात्रा (विषममात्रा) में स्निग्धता से, - विमात्रा में रूक्षता से तथा विमात्रा में स्निग्धता-रूक्षता से बन्धन-प्रत्ययिक बन्ध समत्पन्न होता है। वह जघन्यतः एक समय तक और उत्कृष्टतः असंख्येय काल तक रहता है। यह हुआ बन्धन-प्रत्ययिक सादि-विस्रसाबन्ध का स्वरूप। 9. [Q.] Bhante ! What is this Bandhan pratyayik saadik visrasa bandh (binding force related natural bondage) ? [Ans.) Gautam ! A bonding occurs between one ultimate particle of matter (paramanu), aggregates of two, three ... and so on up to ... ten, countable, innumerable and infinite paramanus due to unequal intensity (vimatra) of smoothness, unequal intensity of roughness, and unequal $i intensity of smoothness-roughness. This lasts for a minimum period of one Samaya and maximum of immeasurable time. This is Bandhan pratyayik saadik visrasa bandh (binding force related natural bondage). १०. [प्र. ] से किं तं भायणपच्चइए? ॐ [उ. ] भायणपच्चइए, जं णं जुणसुरा-जुण्णगुल-जुण्णतंदुलाणं भायणपच्चइएणं बंधे समुप्पज्जइ जहन्नेणं अंतोमुहुत्तं, उक्कोसेणं संखेज्जं कालं। से तं भायणपच्चइए। १०. [प्र. ] भगवन् ! भाजन-प्रत्ययिक-सादि-वित्रसाबन्ध किसे कहते हैं ? 3 [उ. ] गौतम ! पुरानी सुरा (मदिरा), पुराने गुड़ और पुराने चावलों का भाजन-प्रत्ययिक-सादि+ विस्रसाबन्ध समुत्पन्न होता है। वह जघन्यतः अन्तर्मुहूर्त तक और उत्कृष्टतः संख्यातकाल तक रहता है। यह है भाजन-प्रत्ययिक-सादि-विस्रसाबन्ध का स्वरूप। 10. (Q.) Bhante ! What is this Bhaajan pratyayik saadik visrasa + bandh (storage related natural bondage)? [Ans.] Gautam ! This type of bondage occurs in case of old wine, old jaggery and old rice (stored in a pot or other such thing). This lasts for a minimum period of one Antarmuhurt (less than one Muhurt) and भगवती सूत्र (३) (198) Bhagavati Sutra (3) Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002904
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhyaprajnapti Sutra Part 03 Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmarmuni, Shreechand Surana
PublisherPadma Prakashan
Publication Year2008
Total Pages664
LanguageHindi, English
ClassificationBook_Devnagari, Book_English, Agam, Canon, Conduct, & agam_bhagwati
File Size21 MB
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