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________________ ॥हितीयो विमर्शः॥ १ केटलाक नवांशनी ज प्रनुताने लीधे एक तेने ज सौम्यने खस्ने वाकीना अर्गनी शुद्धि विना पण लग्ननो श्रादर करे . तेथी करीने अहीं तत्त्व ए चे जे लग्नने विपे अवश्य ग्रहण करवा लायक नवांशनी शुद्धि कर्या पठी जेम जेम वधारे शुन्न वर्गनो लाल थाय तेम तेम प्रतिष्ठादिक शुन्न कार्यमां तेनुं विशेपे करीने ग्रहण करवं. __ दिशाऊना स्वामी तथा ग्रहोनी सौम्यता क्रूरता कहे जे.ग्रहाः स्युरैन्यायधिपा दिनेशरशुक्राश्र३राहार्किए शशि६७जीवाः। पापाः कृशेन्छर्कतमोऽसितारास्तैः संयुतो ज्ञश्च परे तु सौम्याः ॥ २५॥ अर्थ-पूर्व दिशानो अधिपति सूर्य , अग्नि कोणनो शुक्र, दक्षिणनो मंगळ, नैर्ऋत्यनो राहु, पश्चिमनो शनि, वायव्यनो चंञ, उत्तरनो बुध अने इंशाननो अधिपति गुरु वे. आनुं प्रयोजन ए ने जे-“केंजमां रहेला बळवान् ग्रहने अनुसारे चोरादिक कर दिशामां गया वे तेनुं ज्ञान थाय .” कृश चंड, (एटले वदि चौदशथी त्रण दिवसमां चं कळा रहित होय , माटे ते कृश चंछ कहेवाय डे) सूर्य, राहु, शनि अने मंगळ एटता ग्रह पापी-क्रूर जे, तथा आटला ग्रहे करीने युक्त एटले आमांना कोइ पण ग्रहनी साथे एक स्थानमा रहेलो बुध पण क्रूर बे, अने बाकीना एटले पुष्ट ( कळावाळो) चं, क्रूर प्रहथी जूदो रहेलो बुध, गुरु अने शुक्र एटला ग्रहो सौम्य बे. आनुं फळ ए जे जे क्रूर अने सौम्य ग्रहना बलिष्ठपणाने लीधे (अनुसारे) उत्पन्न थयेला बाळकना स्वन्नाव विगेरेनुं ज्ञान थाय . विशेष प्रा प्रमाणे - "रक्तश्यामो नास्करो १ गौर इन्छ । त्युच्चांगो रक्तगौरश्च वक्रः ३। पुर्वाश्यामो झो ४ गुरुगौरगात्रो ५श्यामः शुक्रो ६जास्करिः कृष्णदेहः ७॥१॥" "सूर्य रक्त तथा श्याम वर्णवाळो बे, चंड गौर वर्णवाळो बे, मंगळ रक्त तथा गौर ने अने अत्यंत उंचा शरीरवाळो नथी, बुध फुर्वा (ध्रो) जेवो श्याम , गुरु गौर गात्रवाळो , शुक्र श्याम ने अने शनि कृष्ण देहवाळो बे." श्रानुं फळ पण ए जने के बळवान् ग्रहना जेवी वाळकनी मूर्ति (वर्ण ) होय जे, अथवा लग्नमां ते ज वखते जे नवांश होय तेना स्वामीना जेवी तेनी मूर्ति (वर्ण) होय . हवे केतुना स्थाननो निर्णय करे बे. पृछादिष्वपरे केतुं तमसः सप्तमं विपुः। शुक्रेन्यू योषितौ मन्दबुधौ क्लीवौ परे नराः ॥२६॥ अर्थ-केटलाएक श्राचार्यो प्रश्नादिकमां केतुने राहुना स्थानथी सातमे स्थाने कहे वे. प्रश्नादिक कहेवाथी जातकमां, ग्रहगोचरमा तथा प्रतिष्ठादिकना लग्नमां केतुनो आ० ११ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002765
Book TitleArambhsiddhi Lagnashuddhi Dinshuddhi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorUdayprabhdevsuri, Haribhadrasuri, Ratshekharsuri
PublisherShravak Bhimsinh Manek
Publication Year1918
Total Pages524
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari & Jyotish
File Size12 MB
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