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________________ नमसंविदिए चदविसाससंचालणास्वतंडवाजियमणाशनवगायउगानणसुहाविया उामनासविर्दिहरदावियाउ तिमरसविख्यजाणियसाद अहविरसमसणासहावे पक्का णायपासलात अवरक्ष्विासावाणुलाव करणश्चरणाचणिवारियाणवतहितहिंधव यारियाणपनश्चदियघटाया पदापणानश्याई मुहश्यमवश्वसर्वत्राणिहामि हुणसवंब तारानारावास विडियचक्कउलझ्मेलवादा डिलरविविखदिर यवसिरिय यरुणकिरणमालाफखिमयपरिमहाराहोऽवशिस्त्रवधग्लिान्डा लहिया समियाथायाडपिधाया अलिरखरसमिया रूवश्वसिसिणियाला दंसस्यविमा लेसियपाल नेयसरिमकरोसश्वतमदोलाजसोहश्दीवियजखदाउणहमदिसरावेपडे विपदा अद्दयामंत्रणलायणयपाण्यंतहाससदोसासरया निवाड्दग्गिणहसायरामाण दिमिनिसियॉगमुझसगासणताहिजेकेदहाविजाननिसिवढयदपयमावणवास रविडयंजरुविण जगकरंडेविमुनिदिनु तातदियोहणसंसारसास का विकडिमुठे हारदोऊ कासुविध्यगयवेलिउखाणु कासुविधांधासुमुवाशीषु जोजमणाश्ततासदिए। १९ भौंहों के संचालन से मन को रंजित करनेवाला चौदह प्रकार का संचालन किया. तथा मनों को रंजित करनेवाले भौंहों के ताण्डव भी किये। नेत्रों को सुहावनी लगनेवाली नौ ग्रीवाएँ, तथा छत्तीस दृष्टियाँ भी प्रदर्शित की जो (कमलिनी) चन्द्र की किरणों (पादों - पैरों किरणों) से आहत होकर दु:ख को प्राप्त हुई थी, भ्रमरों गयीं। अन्तिम रस (शान्त रस) से रहित, हाव उत्पन्न करनेवाले सचेतन स्वरूपवाले आठों रसों का (प्रदर्शन) के शब्दों से गुंजित ऐसी कमलिनी जैसे रो उठती है, और अपने प्रचुर ओसरूपी आँसुओं को दिखाती है, किया गया। एक कम पचास अर्थात् उनचास (संचारी) भाव, तथा दूसरे और अपूर्व भाव (स्थायी भाव) अन्धकार का हरण करनेवाला सूर्य मानो उसके आँसुओं को पोंछता है । जम्बूद्वीप में आलोकित वह (सूर्य) और अनुभावों का भी प्रदर्शन किया। नृत्य करती हुईं उन्होंने अनिवारित स्फुरण, बलन आदि की अवतारणा ऐसा शोभित होता है मानो आकाश और धरतीरूपी शराव-पुट में दीप रख दिया गया हो। मानो अधखुला की। फिर वन्दित पदरज को प्राप्त होती हुई छडुनक (ताल विशेष) के साथ चली गयीं। मुग्ध प्रेमान्धों को लोकनेत्र हो, मानो आते हुए शेषनाग के सिर का रल हो, मानो आकाशरूपी सागर की वडवाग्नि हो, मानो क्रुद्ध करता हुआ, स्नेहहीन जोड़ों को सन्तुष्ट करता हुआ, ताराओं और चन्द्रमा की कान्ति का अपहरण करता दिशारूपी राक्षसी के मुँह का कौर हो, या मानो उस (दिशारूपी राक्षसी) का अधरबिम्ब हो। मानो निशारूपी हुआ वियुक्त चक्रवाक समूह का मेल कराता हुआ वधू का आरक्त पदमार्ग हो, मानो दिवसरूपी वृक्ष का अंकुर निकल आया हो। मानो विश्वरूपी पिटारे में घत्ता-अरुण किरणमाला से स्फुरित सूर्यबिम्ब अपनी दिवसश्री के साथ ऐसा उदित हुआ जैसे प्रवाल रख दिया गया हो। ऐसे उस महोत्सव में किसी को विश्वश्रेष्ठ कटिसूत्र, दोर (डोर) हार, किसी को उदयाचलरूपी महाराज पर नवरक्त छत्र रख दिया गया हो॥१८॥ हृदयगत सुन्दर वस्त्र, किसी को धन-धान्य, सुवर्ण और अन्न, जिसने जो माँगा उसे वह दिया गया। Jain Education International For Private & Personal use only www.jainelibrary.org
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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