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________________ ता सिय कुसुमवाणु फणिदलवारियनिणिरुड वास खालोश्यतिमाणसा पठण ससिपवरु न्यूयायल लिपसिंहासनु तद्विपत्र कुलयलाई सोणिणिणिसुविदेवा हिदेव किंमहवकद्दमे कमलसंड पादाजपत्रकणयपिंड आसाम हो मिहिरुमहामर्कङ सिप्पिन डिविमलमा शियसन हडपिन किं महिमाणु सुवणाय करणाणुजेपदायु पहला डंपा सिन कोम को ग्रिन पिमोहन अडत्रणेण दंउलामिकि पिविहवालन निजति तोदिशालारिह नवरिम किनाविवामाद जेणापवतश्लोयगा जलहिया पविमलवा दिया मोहविरोदिणा लडसमादिगा ह दाप्पा हि विपात्री तामन मणियमाणं यखळा एम। कासंसार | माईधार ग्रहिणिणं किमिउलघुणं पसलिम्मु त्रं मंसविलिप्पाणिर्द्ध अश्एाई लालागिनंरुदिजला चकमल कलुस धरिमपुरीसं कुछियगंध नवभिदं निवास कामदेव को त्रस्त करते हुए नागेन्द्ररूपी प्रतिहार से अवरुद्ध द्वारवाले, और देवताओं के स्थानसार को देखनेवाले प्रभु सिंहासन पर बैठे हुए ऐसे लगते थे मानो पूर्णचन्द्र महान् उदयाचल पर स्थित हो तब कुलकर नाभिराज वहाँ आकर इस प्रकार कहते हैं-"हे देवाधिदेव, सुनिए, सुनिए क्या कीचड़ में कमलसमूह नहीं होता? क्या पत्थरों के समूह में नवस्वर्ण पिण्ड नहीं होता? दिशा के मुख में महान् किरणोंवाला सूर्य विमल सीप सम्पुट में मोती-समूह नहीं होता? मैं पिता तुम पुत्र, यह कैसा अभिमान? तीनों लोकों में ज्ञान ही मुख्य है। आकाश मार्ग से बड़ा कौन है? तुम्हारे आगे बुद्धिमान् कौन है? अपने स्नेह से अथवा जड़ता से धृष्टतापूर्वक कुछ कहता हूँ। Jain Education International श्रादिनाथत्राग नासिराजा विवा हकी वीनती करणे ३३ घत्ता – यद्यपि तुम्हारा बचपन दूर छूट गया है तब भी तुम्हारी मति स्त्रियों के ऊपर नहीं है। हे सुकुमार, विवाह कीजिए जिससे लोक की गति बढ़ सके " ॥ ६ ॥ ७ तब प्रबल बोधवाले, मोह के विरोधी, समाधि प्राप्त करनेवाले और मन के दर्प को दूर करनेवाले प्रभु बोले, "हे तात, काम का समर्थन करनेवाले ये शब्द युक्त नहीं हैं। संसार के बढ़ानेवाले मोहान्धकार से युक्त, हड्डियों से कसा हुआ, कृमिकुल से पूर्ण, प्रगलित मूत्रवाला, मांस से लिपटा, स्नायुओं से बद्ध, चर्म से लिपटा, लार को खानेवाला, रक्तजल से आर्द्र, प्रचुर मल से कलुष, मैले को धारण करनेवाला, कुत्सित गन्धवाला, नौ प्रकार के छन्दवाला ( यह शरीर) निद्रा में आसक्त होकर For Private & Personal Use Only www.jaina65
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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