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________________ लढयाउउदलिठकरेविवयासविसबुद्धिसालावयासुत्रा यनमडविवाहव्यास गिरिसाहलयमईबासवाहाजिणु सोटकहहिवासवहिं गिरिसोवियलियनिशाहिनियु सोहरकामानिारहिगिरिसोझणाणाविहमपहिनियमो हरिसिहिखनिम्मपहिगिरिसोहमचिटमोरयहि जिएसो ARRERana हसरसरमरहि गिरिसोहधम्मनपराजमाजिपुसावश्य मणएणत गिरिपरिचितसराहवेण जिणुपणवतेंसर रहाहियाधिवासाणाङसम्मुम्बायतरहिंदाहसमयसंतापवयणिमषामगोनहाकाशतिम वित्राउपमाणशाशमुणियबरेंकिंडकिरिथविहाण रुस्तणणसगरमापु पासारिउदंडायारु जाउ तिजगरमचरमणदनुपाठ अपसारियुष्युराड पतियणधरदिनलकवाइअप्पा बरदेवदेवावि मत्रालारसहसतिथिमानाससलायपुरणकरविाविवरिवारसंदरवि तेजश यकाउंगलिदातिलिविगणिहालियामुणिमल्लविनिमसद्धमुकिठिसंपतुचम्छ। छम्मकिरिडासहिंसवमापत्रामजोशमणक्यणकायमुकलविहारथिनदेहतरसामिसाला ३२० शीघ्र अपना मुख नीचा कर, पवित्र बुद्धि और शील का आश्रय भरत अष्टापद शिखर पर आया। उसने देखा-गिरि मधुवृक्षों के च्युत आसव से शोभित है, जिन रुद्ध आस्रवों के कारण शोभित हैं। गिरि बहते हुए झरनों से शोभित है, जिन कर्मों की निर्जराओं से शोभित हैं। गिरि नाना प्रकार के मृगों से शोभित है, जिन नाना प्रकार के मदरहित मुनियों से शोभित हैं । गिरि नाचते हुए मयूरों से शोभित है, जिन (नमित) देवताओं के मुकुटों से शोभित हैं गिरि धर्म नामक (अर्जुन) वृक्ष से शोभित है, जिन धर्म और न्याय से शोभित हैं, जिस प्रकार गिरि शवरराज से सहित है, उसी प्रकार जिन प्रणाम करते हुए भरतराज से। घत्ता-तब स्वामी आदिनाथ ने समुद्घात विशेष से लम्बे समय की सन्तानवाले वेदनीय, नाम और गोत्र तीनों कर्मों का आयुप्रमाण कर दिया॥१९॥ २० मुनिप्रवर ने, विशालता में अपने शरीर के मान का क्रियाविधान किया (अर्थात् शरीर से आत्मा के प्रदेशों को बाहर निकालना शुरू किया), दण्डाकार के रूप में जीव को बाहर निकाला और उसे तीनों लोकों के अग्रभाग में, नित्यनिगोद नरक के निकट तक ले गये। मानो तीनों लोकों के लिए किवाड़ (द्वार) दे दिया हो। देव ने देवों से प्रणम्य अपने को प्रवर आकार में स्थापित किया। समस्त लोक का आपूरण कर, फिर विपरीत भाव से संवरण कर (अर्थात् लोकपूरण, संवरण, रुजक्कार संवरण और दण्डाकार संवरण कर) उन्होंने तैजस्, कार्मिक और औदारिक तीनों शरीरों को निश्चल बना लिया। फिर तीनों सूक्ष्म क्रियाओं को छोड़कर चौथे सूक्ष्म क्रिया शुक्लध्यान में स्थित हुए। वहाँ वे आयोग शुक्लध्यान में अवतरित हुए; वह मन, वचन और काय से मुक्त होकर शोभित हुए। स्वामी श्रेष्ठ, इस प्रकार अपनी देह के भीतर स्थित होकर 679 www.jainelibrary.org Jain Education International For Private & Personal use only
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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