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________________ जयगुचनणययशुमणस जपचाचप्रायमपञ्चामुणुविजयसडाखविजयामि शुविजश्लसिरित्रवादपिकावरविपरमेसरपरमोश्चरासागपहरणवमाशावता। गाधररचना विहियामिदियाऽवसिनियमेमाणलीपमधीएजोश्यजए यपालियजमकरणासचविसाइटडारशन्नतवमहातवस तपद दिनतवततधोरतवह तवसिहजविज्ञाहरा हं.अणिमाइदाणहृदयणघरह आहारयतालेधारयाह मयरदियहमारकासारखाह अवियलसुनसायरपाखाहना 14 महनासंगहनास्याहं ययवासकाहबुद्धीवराह तेजारिडिसि। हिसासुराह पंचविहणाणण्याक्षणा बुझिनपणचपजाय याई छामासबरिस्ठवधासयाह तवकोटखंदवासियाह कंदपादप्रविणिवारणाई बालम दिसंक्षणहचारपत्र समसमिकंचणतणाई पासायदावनिवलमणाङटापखायगिरा हराह पलियकचहलंबियकराई खविधवपरवसिखायाई चनयसीसहसजसरादालाए। ऊसासोमणकदिवसुणियद्धसेयंसुसभियतणाएकपखिखलायणवशपिया रायरिसिया ३३५ ALWAN/ महनामावविहण फिर यज्ञगुप्त और फिर सर्वगुप्त, फिर सर्वार्थगुप्त जैसा कि आगम में कहा गया है। फिर भट्टारक विजय, विजयमित्र, विजहल (विजयदत्त) और श्री अपराजित और भी परमेश्वर, परमज्योति इत्यादि चौरासी गणधर थे। पत्ता-विधाता के द्वारा भित्तितल पर लिखे हुए के समान, ध्यान में लीन और मन से धीर, सभी यम को जीतनेवाले आदरणीय गणधरों को जय ने देखा ॥३॥ आशा में लीन रहनेवाले, अविचल श्रुतरूपी सागर को पार करनेवाले, नग्न-अनासंग-निष्पाप, कोष्ठ बुद्धीश्वरों को पदों में प्रणत करानेवाले, तेज में ऋद्धियों और आग से भास्वर, पाँच प्रकार के ज्ञान को प्राप्त करनेवाले, पदार्थ और उनके पर्यायों को जाननेवाले, छह माह और एक वर्ष में उपवास करनेवाले वृक्षों की कोटरों और पहाड़ी कन्दराओं में निवास करनेवाले, कामदेव के दर्ष को चूर-चूर करनेवाले, जलश्रेणी-तन्तु और आकाश में विचरण करनेवाले, शत्रु-मित्र, काँच और कंचन में समताभाव धारण करनेवाले, प्रासाद में रखे हुए दीपक समान निश्चल मनवाले, अजेय पर-सिद्धान्तवादियों की वाणी का अपहरण करनेवाले, पर्यकासन पर हाथ लम्बे कर बैठे हुए इन्द्रियों के पक्ष का नाश करनेवाले, भिक्षा में रत चौरासी मुनिवरों को देखा। घत्ता-ये दिव्य मुनि सोमप्रभ हैं। ये मन को शान्त करनेवाले राजा श्रेयांस हैं। ये देखो सुलोचने, तुम्हारे पिता राजर्षि अकम्पन हैं ॥४॥ उग्र तप और महातप तपनेवाले, दीप्त तप तपनेवाले, घोर तपवाले, तप से सिद्ध पूज्य विद्याओं को धारण करनेवाले, अणिमादि गुणों से सम्पन्न गणधरों, आहारक शरीर को धारण करनेवाले मद से रहित, मोक्ष की Jain Education Internations For Private & Personal use only www.jai6690
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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