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________________ यासहियांगहणणितिनियम सम्माणहिमसम्माणियूमरावनिमंदिस्थापियाडातालधिता उपसाहियानवमालामालावादियाउ पुरचियतछुपरिहियागोयरर्दिउक्कंठियला सदस्यका दिविविश्यमा मायापिमरदंविछाउमा पहिलारउपरिणयसदिसले जसवणामंजसकतिज्ञया हणुअवधारयद्यपि रडकंताध्यान्सुदासिपिर विद्ध श्रीपालुजसत् ग्निताबमावावणअहदितपिार्दिसकमेलनाधादिहनकरी वीविवाहदापना असोधिनललिउ यत्रासमिहिणजिएमिलियाघताजाय विसवतिर्हि मजदपिउत्रिहिनाससेविडम्हणणहोसाव सकुद्यातकपमहाप्रासंघिउघरजगणोपासुहवर यदायहोवझरिल भूगोमरलगायरिथरिठ मणेतिणचार वियाऽअपरध्यपविदिवायड मठमविरिजाब हा पहिलजकिराहधरिलकअधिससविवादकिकरमिवरानिलकपावनधारभिानग्य ननरिएखजियहो आलिंगयुदेमिणतसुपिाही पडिलवजणणमुश्कलकमूलना चिडहाश सदाचंचलायमापहिकसमाहिंदिणुगमशकिएकहवेल्लिहिचलिरमर्शय तरेसिरिचालन अशनिवेग विद्याधर ने इन्हें जंगल में छिपा रखा था। मेरे द्वारा सम्मानित इनका आप सम्मान करें। इस समय लेकर सुखावती दुःख का हनन करनेवाले पिता के घर तत्काल चल दी॥१॥ मैं इन्हें तुम्हारे मन्दिर में ले आयी हूँ।" तब कुबेरश्री ने मालती मालाओं को धारण करनेवाली उन कन्याओं का प्रसाधन किया। हतदैव ने पहले से ही वहाँ स्थित और उत्कण्ठित इन मनुष्यनियों से वियोग करवा दिया, सुखावती ने मनुष्यनी यशस्वती आदि का चरित अपने पिता को बताया कि वे गुणों के कारण आदर ये माता-पिता से भी विमुक्त हुई। सबसे पहले श्रीपाल ने यश और कान्ति से युक्त सेठ की यशोवती कन्या करनेवाले तथा अनुरक्त हम विद्याधरों को कुछ भी नहीं मानते। उसने (श्रीपाल ने) शत्रु के प्राणों का अपहरण से विवाह किया। उसके बाद दूसरी स्थूल और सघन स्तनोंवाली तथा सुमधुर बोलनेवाली रतिकान्ता आदि करनेवाले मेरे हाथ को छोड़कर उस किराती (यशस्वती) का हाथ पहले पकड़ा। इस अतिसामान्य विवाह से। उन आठों कन्याओं के साथ विरहाग्नि के सन्ताप को शान्त करनेवाला मिलाप करता हुआ वह सुन्दर से मैं क्या करूँगी? अच्छा है कि मैं अचल कन्याव्रत ग्रहण कर लूं। दूसरी स्त्रियों में रत होकर रंजित करनेवाले प्रिय श्रीपाल, उसी प्रकार देखा गया जिस प्रकार गुप्तियों और समितियों से मिले हुए जिन-भगवान् देखे जाते उस प्रिय को आलिंगन नहीं दे सकती। तब पिता ने कहा-हे पुत्री, तुम ईजिनित खेद को छोड़ो। विट स्वभाव से चंचल होते हैं । भ्रमर दूसरे-दूसरे फूलों में दिन गवाता है। क्या वह एक लता में रमण करता है? घत्ता-अपनी सौत वणिक् पुत्री यशस्वती का मुख देखकर ईर्ष्या के कारण क्रुद्ध होकर और उच्छ्वास इस बीच में श्रीपाल ने Jain Education International For Private & Personal use only www.jainelibrary.org
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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