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________________ जहासउदिशाशरक्जिमाविमहेलियण सोकिहसंदरमिजशासचवकिसायरिएनअजा बारेधूमवेयपचन्ना मणमग्नुजसअनशखयरेंसडजस्खयरजेइंशाण्डधण्य रुहंगयषसावधिविनउपसरहिनियकाजसडण्डर्किपिप्रासंज्ञविवरीयालणार पाउविवकरजश्वहममरहिण्यहोयवला नोदनपश्मिजजियमहाणलाखलदलवहाम। हरिसेनमि वहिउणारिणखामियाउरणियपाडणमल्लमि तिखदिखलपाईहरपल्लमिएम लवेनलेसंक्षा करवालेण्डलघडहायडालातिाजायाधिषिमुहावडा जनयखन्न मवेगुडेपाव विहल हणुपसणतिरकरवि यक्कडझममळउन एक्कुविसकृतिचिनिचमकर मुहहण्ठमनिविसेंथक्कलाडू तीसंग्रामकरणे पणचढिएसजाय कमकमावसंजाय वेदिधुमव। उविसर्हि बाहजिगजिगतमितिमहिं विपखजार सिरितकंहिट सोविजासुविहिवर्दिसदि तावन्नमणिवर समाधामहि वयहाँतिरिखकजविवेयहि अविमुगल रकाहामवणतरयाकाणावातएसमयकाहययहाएपिपलडदिरिसिरकमलाख कहिमिवर्णतरे यावेजमुषणविभिपरगर ७ मुझे हँसी आती है कि वह तुम महिला द्वारा रखा जाता है ! वह तुम्हारे द्वारा कैसे रमण किया जायेगा? ॥ ६॥ घत्ता-तब जिनके हाथ में उठी हुई तलबार है ऐसी सुखावती दो हो गयी। और मारो-मारो कहती हुई युद्ध में समर्थ वह स्थित हो गयी ॥७॥ वह कृशोदरी सुखावती कहती है कि हे धूमवेग ! जो तुमने कहा वह ठीक नहीं है। साँप की मार को साँप ही जानता है। यदि विद्याधर के साथ विद्याधर लड़ता है तो यह ठीक है। यह धरती का निवासी है और उसे देखकर सूर्य और इन्द्र भी अपने मन में चौंक गये। वह सुभट भी मारता हुआ एक पल के लिए तुम आकाशचारी । इसलिए विद्या छोड़कर तुम अपना हाथ फैलाओ। यदि यह तुझसे कुछ भी आशंका करता नहीं तकता। वह कन्या भी दूनी-दूनी बढ़ती गयी। कन्यारूप में उत्पन्न उस युद्ध में चमकती हुई तलवारों है, और उलटा मुँह करके थोड़ा भी काँपता है, यदि तुम इसके भुजबल से नहीं मरते तो मैं जलती आग में से धूमवेग चारों ओर से घिर गया। तब विजय श्री के लिए उत्कण्ठित, फड़कता हुआ, वह भी जब दो रूपों प्रवेश कर जाऊँगी । हे दुष्ट, तुझे चकनाचूर कर मैं हर्ष से नाचूँगी। मैं कहती हूँ कि ( मैं ) शत्रुओं को मारनेवाली में स्थित हो गया तो राजा श्रीपाल ने कहा कि तुम आक्रमण मत करो। बहुत से शत्रु पैदा हो जायेंगे। अपने हूँ। आओ-आओ मैं अपने स्वामी को नहीं छोड़ती। तीखे त्रिशूल से तुम्हारे छाती को शरीर को छेद दूंगी। काम का विचार करो। किसी वनान्तर में मुझे छोड़ दो, युद्ध जीतने पर फिर आ जाना। एक हृदय होकर तुम ऐसा कहकर धूमवेग ने आक्रमण किया और तलवार से अलंध्य दो टुकड़े कर दिये। लड़ो। और शत्रु के सिर कमलों को Jain Education International For Private & Personal use only -- --- www.jainelibrary.org
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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