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________________ णिचरिउनियछमाणु यवियणरितमहिरुदकिसाप विथुसालकोसंपलाएपारदिनकोसेविदा याए सणुसासनरामपसाउकामा सघरकृविकिन्नडहाकवास वसणे पमकिन कोडरोनिरहु अपणि चिनकोनछुछियायविवचिउना सहि महिनलिकादिनवार स म्प दतेहि पछिटाजपुजिहस्त्र शाथानाध्यमहाचरायोति AAसहिमहापुरिसुगुणाकारामदादा इसमवेतविरश्यामहाकनाम) दासदसरहाणुमस्मियाविज्ञहरमा यावरणपामन्तीसमोपरि छिनसम्मलाताबाहिवस सबंधुरहितनकेनतेजचिना सो तानकमतोगवापिहिमाष्टासो सवमा यस्पाचारपर्दवदंतिकवा व्यासजन्यसत्यारपद सोटाबासरतोज यत्यूसम कालकलासाधतावका साकवडपश्वय श्राववियपयाणियपियसवणिपन्हा कामिणिमणहारे तहिनिकमारेकमपिसलियदिहीमा जिबसविमलमदेविसयाकमजवर णामसाहनजयाविज्ञासमाहणिगयगहिया आणियापिळवणुससय महियानिखिपासंदरूपछि यहतिडवाणिजोजोइक्लियर तहातहोवडंबंधवदेहिसिनामङत्तपमहकरहिसणाहाकया सात उस दुश्चारिणी के चरित्र को देखनेवाला वह कुमार जो कि शत्रुरूपी वृक्षों के लिए कृशानु (आग है), विचार सन्धि ३४ करता है - गर्वहीन शील को कौन सम्पादित कर सकता है? कौन शिकारी दया से सेवित हो सकता है? नियमों का त्याग करनेवाली वह मायाविनी पतिव्रता अपने प्रिय के भवन में प्रविष्ट हुई। वहीं पर बताओ कि राजा का प्रसाद हमेशा किसे मिलता है ! घर की आग किसे नहीं जलाती है ! व्यसन से संसार कामिनियों के लिए सुन्दर कुमार ने एक कन्या देखी, जिसे 'भूत' लगा हुआ था। में कौन व्यर्थ नहीं हुआ! असतीजन से संसार में कौन वंचित नहीं हुआ ! घत्ता-इस धरती पर नारियों से वंचित नहीं होते हुए कोई नहीं बचा। भरत और पुष्पदन्त दोनों ने देखा कि लोगों को क्या अच्छा लगता है।।१३ ॥ जितशत्रु और विमलावती देवी की कमलावती नाम की सौभाग्य से युक्त कन्या थी। विद्यासिद्धि करते समय वह 'भूत' से ग्रस्त हो गयी। अपनी बहनों में आदरणीय उसे मरघट ले आया। जितशत्रु ने सुन्दर कुमार इस प्रकार प्रेसठ महापुरुषों के गुणालंकारों से युक्त महापुराण में महाकवि पुष्पदन्त द्वारा विरचित से प्रार्थना की कि इस त्रिभुवन में जो-जो दु:स्थित है, पीड़ित है उसके लिए आप बन्धु हो। आप इतनी श्री एवं महाभव्य भरत द्वारा अनुमत इस काव्य का विद्याधरीमाया-प्रवंचन नाम का तैंतीसवाँ अध्याय दो और मेरी लड़की के स्वामी बनने की कृपा करो। समाप्त हुआ॥३३॥ Jain Education International For Private & Personal use only www.jainelibrary.org
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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