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________________ सुघावतीमालणि हपहसमणासशंदियश्वाश्मयालासश्यासिवाईसह रुपुधरिवरपिटा {रसविद्दावीसश्चारचलपनिवडूशवसवालहोजायविर रावनमाहेतारि दसेसमिनियमूरपंदणवणेपसमिश्यचितवजाबसाया करिश्रीपालपाति छशानियवंधवसंजोउनियकताहयवंडझालदंतिपदेहि वश्ववेदीय मानुसासिठपहतिएमद्धफलाकिसहियएलएकाही वय एक्वनिलजमिरिकहि ववभडिअमबुनजंपत्रिम म्नहितसम्लुसमयाचिजश्यावहिवळुमयरूमहारासा। णिझणविदलिनुहारमा कवणुपलरका जायठासपश्येरिसकिंचाइनानात निमुणेविसामसरिपुंडरिकोणदिनरायणवालुरामतदातपटसुटावसुवालहोतामह हटलहठाजगसिरिवालनामजाणिकालिखखाणाततिगामधिमायादरिवरणए हाणि जोयसिदित्रपेयहिंझापिने अधिनसतावेषिहिमालमिरहठकठिठाजश्मा यरझामिलमिताजावधि मनोनिहरजमउरिपावधिसणवलछमस्वरुंदापळायपासवें। होसिणगणाचारहिलियम्बंधिविनश्यमाकवणेदवंगुर्कमिड्यापरदारंगबुढाधाकना पथ के श्रम को शान्त करनेवाले अमृत का आभास देनेवाले उसने बेर दिये। उस सुभग ने रस से स्निग्ध उनको घत्ता-यह सुनकर चक्रवर्ती कहता है-कान्ति से युक्त पुण्डरिकिणी नगरी में गुणपाल नामक राजा खा लिया। और दूसरे बेरों को अपने अंचल में बाँध लिया। (यह सोचकर कि) इन्हें राजा वसुपाल को है, उसका पुत्र वसुपाल है, मैं उसका छोटा भाई हूँ॥२१॥ दिखाऊँगा और अपने नगर के नन्दनवन में इन्हें बोऊँगा। ऐसा सोचता हुआ जब वह बैठा था, तभी अपने २२ भाई के संयोग की इच्छा करता है। तब जूही के फूल के समान उज्ज्वल दाँतोंवाली उस वृद्धा ने हँसते हुए जग में श्रीपाल के नाम से जाना जाता हूँ और देव-वणिओं में 'मैं' गाया जाता हूँ। एक मायावी घोड़े कहा कि मेरे बेरों की कीमत दो, मेरे फलों को क्या तुम मुफ्त खाते हो? निर्लज्ज की भाँति मेरा मुख क्यों द्वारा मैं यहाँ लाया गया हूँ। यह बात समस्त ज्योतिषियों के द्वारा जानी गयी है। गुरु के वियोग के सन्ताप देखते हो? तब राजा कहता है कि मैं झूठ नहीं बोलता. जो तुम माँगती हो वह सब दूंगा। यदि तुम मेरे नगर से दु:खी अपने प्रियजनों के वियोग में अत्यन्त उत्सुक दुःखी 'मैं' यहाँ रह रहा हूँ। यदि मैं अपने भाई से में आती हो तो मैं तुम्हारा दारिद्र्य नष्ट कर दूंगा। तब वह वृद्धा कहती है कि तुम्हारा कौन-सा नगर है? मिलता हूँ तो जीवित रहता हूँ। नहीं तो निश्चय ही मैं बमपुर के लिए चला जाऊँगा। वृद्धा कहती है कि अरे तुम कौन हो? तुम्हें किसने जन्म दिया ? और यहाँ किसलिए आये हो? तुम तो दीन व्यक्ति मालूम होते हो। इस स्वभाव से तुम राजा नहीं मालूम होते हो। तुम बेर बाँधकर लाये ! किस विधाता ने तुम्हें राजा बनाया। तुम दूसरों के दारिद्रय का क्या नाश करोगे! Jain Education Internations For Private & Personal use only www.ainelibrary
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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