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________________ अदिनिकासशस्दय माड्दए चरणाशा लछाममणिणिहिछ सोळायपदाससलिलुरघाताप्तहिमिलेविछससद्धि पाणिवहिंघबिट घडस्पदि चिकिल्लतललोलपविलाल घिनसयलमाश्वमलालकोल माणिकूणदिउँतो केन्। वकमाइधाहाजणवायजम्मामालिसंपळासाहगयघरहापरिसिटमतिखाहायता गुप्ता गावएसयपायकावयापयहिपदविकारश्वसमध्यपहाणादाचरणहिरिहण मंडलियमडरुमायया हाणानसन्नसुप्पहायततरूणामति पाळदानवपासादावपउन्फरूममणणादादमुजणासस्वरण घानखशिनवमहानगपाउतबदणुसुणायाधमलवयन हिरटेहामहरायहरमहासरचूडामणिमयसरण खरिजशका दसदरिहरण छवितब नउमदंतजासुगड कससिरिनवसश्ताखगहेससिहतिमन्नतिबग्नलिंग सल्लाउसवणेवियहसमा नचिसविनियकुलकमलमि कोकाविडतेणकुवरामि आउहिउतनारासमात्र २८य वसविसापालमुधित्तु तंतिसुणविमाजनुएम पाप NERAL बावड़ी के तल में मणि रखा हुआ है, उसकी कान्ति से जल लाल दिखाई देता है। तब संशयरहित उन लोगों ने सैकड़ों घड़ों से बाबड़ी का जल बाहर फेंक दिया। समूची बावड़ी कीचड़ के तलभाग में लोटने से ऐसी मण्डलित मुकुटों की कान्ति के समान शोभित, प्रभात में आसन पर बैठे हुए राजा से उन तरुण मन्त्रियों दिखाई देने लगी मानो चंचल, क्रीड़ा करता हुआ सुअर स्थित हो। परन्तु उन्हें माणिक्य उसी प्रकार दिखाई ने भी कठोर शब्दों में कहा कि जिसने तुम्हारे सिर पर लात से प्रहार किया है, हे राजन्, उसके पैर को काट नहीं दिया जिस प्रकार अत्यधिक मोह से अन्धे लोगों को जिनवर के वचन दिखाई नहीं देते। अज्ञानपूर्वक दिया जाये। वह वचन सुनकर विमलवंश का वह राजहंस अपना मुँह नीचा करके रह गया कि मेरे सिर की क्लेश से सिद्धि नहीं होती। वे घर गये। वहाँ मन्त्री को बुद्धि की फिर परीक्षा की। चूड़ामणि, कामदेव की शरण सुन्दरी का चरण कैसे खण्डित किया जाये? जिसके घर में महान् अविवेक पत्ता-अत्यन्त गर्वीली प्रणयपूर्वक कोपवाली पत्नी वसुमति ने रात्रि में पैरों पर पड़ते हुए प्रेम करनेवाले रहता है, उसके घर में लक्ष्मी बड़ी कठिनाई से निवास करती है। अत: जिसे समग्र त्रिवर्ग की पहचान सिद्ध राजा के सिर को पैर से आहत कर दिया ।। २६ ।। है ऐसा वृद्ध संग ही जग में अच्छा है। यह विचारकर, अपने कुलरूपी कमल के लिए सूर्य के समान कुबेरमित्र को उसने बुलवाया और पूछा-पानी का वह लाल होना और जो सिर में पादान से आहत किया गया था। यह सुनकर आदरणीय कुबरमित्र ने कहा Jain Education Internation For Private & Personal use only www.jana559rg
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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