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________________ होनउसकसहारसासूखहेनिसमुलउपरिश्रावयिणसाहाउरिपहुाघरदिहुराएलियसि। याबकवरुममिउपसरियकिवण निउनियनिवासदादिषुाड गाजलुमा हिंसफलगाना आसपासणुनिवसागसमय तटकरविमविगवकिपिसग्नुमुनमरुअनुपायडियासिरिद सहिदेय एडरितिषिश्वदिपलपालमारिदमिहिनचिनु वणिहमउमामक्रवरामिहछिनातहोमारिणि मरि विसकारिणि जविनसम्माहिणि वमपालबिडकिखालेविहाम्ययावश्हिणि पुन्नक्किवि कुवेरमिधलक हवतावियणियाणि साएकतासघरिणिािहाणि गनेसरिसयल अघिटिया निवडून सहिणिय कलापवाण धयरहगमणसण) रमलारमारे॥ वाणासवदेवपाक्षपखवरण तंत्र जयुदद्दढयवाघचह झापामरावतहु जायउँपुरसहि निवासिंपल पारावयाचल्लुम पोहिरामुगुजारुपाचगणमा सुतंधप्पखुजयवावणहिंस। भी सहारा नहीं दे सका। वह श्रेष्ठ योद्धा ससुराल से भी चला आया। आकर शोभापुर में प्रविष्ट हुआ। कल्याण चाहनेवाले तथा बढ़ रही है दया जिसमें ऐसे उसने राजा से भेंट की और वधू-वर को माँगा। वह उन्हें अपने दूसरे जन्म में निदान बाँधनेबाली तथा पुत्र की इच्छा रखनेवाली वह इकतीस स्त्रियों में प्रधान थी। गर्वेश्वरी घर ले गया और अपना घर, गोकुल, भैंस, फलक्षेत्र, ग्राम, आसन, भूषण और वस्त्र सब कुछ दे दिया। मन्त्री वह समस्त कलाओं में निपुण, हंस की तरह चलनेवाली, स्वर में वीणा के समान थी। पशुवध करनेवाले भी तप करके कहीं स्वर्ग चले गये। मेरुदत्त भी मर गया। तथा प्रकट है वैभव जिसका ऐसी उसी देश की उस दुष्ट नवदेव ने उस वधू-वर की आग में जला दिया। घर में आतंध्यान कर वहीं मरकर वे इसी नगर के पुण्डरीकिणी नगरी में कुबेरमित्र नाम का वणिक् हुआ, जिसका चित्त राजा प्रजापाल में लगा रहता था। सेठ के घर में सुन्दर कबूतर के जोड़े के रूप में उत्पा हुए हैं, गुंजा के समान अरुण आँखोवाले, रंग से पत्ता-फिर धारणी भी यद्यपि वह सम्यक्त्व धारण करनेवाली नहीं थी, पुण्यकारण से व्रतों का पालन श्याम। कुबड़े और बौनों द्वारा वह कबूतर कबूतरी का जोड़ा ग्रहण किया जाता कर, पाप को नष्ट कर धनपति की सेठानी हुई ।। २०॥ JainEducation International For Private & Personal use only
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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