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________________ स्वरसनि नहिनयुणरविसाणाससंति पारावश्हडेर मधेस्वरुसुलोदना सणासिधिवकुलमनाचक्षुदासि घईरस्वरूप पारापतियुगलुर करितवस्मग पारावलनशिलग्नापिटगावासलगाताजता। कहिनिववृ कर्टिसोरइवह कवचल्लवकिनऊया पतिहिगिटसवितिहि कश्यवपाजपखाशा सोमप्यहपुतवासर जामणससयहरणायरणजा पतपदिसुदसायपणापछियापियवाहविलाय. सुलोचनापूर्वतव मुळतहाकंक्होसुविधाबहरसुलायणनिलचा पावसेनमेघेश्वर R -60 रिवर्सजदावरदिसिविदह पुकुलशनसपण प्रति। विसालगडे बमहमहाहरनियंडदसतिदिधन्दामाल वणतवासासाहापुरचरणयपालुरामादबासारदानसजा ऐसारामतहावदियापापकरुहरेणु सामपसिठसा SUIDविस अडसिरिघरिणयालिंगियरेक्षणरशस्व। २०४ हा रतिवर, हा रतिवर-यह कहती हुई, वह नि:श्वास लेती हुई फिर से उठी। "मैं रविसेना कबूतरी थी, पूर्वजन्म की कुलपुत्री तुम्हारी दासी, और तुम रतिवर कबूतर थे, इसमें जरा भी भ्रान्ति नहीं।" यह कहती हुई वह प्रिय के गले से लग गयी। पत्ता-कहाँ वह राजा-कहाँ वह रतिवर, कपट से ही प्रिय बनाया जाता है ? जय की पत्नी की सौत ने कहा कि कैतव (छल-कपट) से लोग नाश को प्राप्त होते हैं ॥११॥ जन-मन के सन्देह के निवारण में आदर रखनेवाले नागर अवधिज्ञान के नेत्रवाले सोमप्रभ के पुत्र ने जानते हुए शुभभावना से प्रिया से पूछा। पुराना वृत्तान्त पूछते हुए पति से सुलोचना अपना चरित कहती है-"इस जम्बूद्वीप के पूर्व विदेह में विशाल घरोंवाला पुष्कलावती देश है। उसमें विजया पर्वत में स्थित धान्यकमाल वन के निकट बसा हुआ शोभापुर नाम का नगर था। उसका राजा प्रजापाल था। वह अपनी देवश्री देवी का अत्यन्त अनुरागी था। जिसने चरणकमलों के पराग की वन्दना की है, ऐसा उसका प्रसिद्ध शक्तिषेण नाम का सामन्त था। अटवीश्री गृहिणी के द्वारा आलिंगित शरीर वह ऐसा लगता था मानो रति से Jain Education Internatione For Private & Personal use only wami-547ng
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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