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________________ कावालियतिजाअहिं पहालंकियसासहोलकणु मंचावरणिग्छिणाइविलकणु जामश्चणि आसिधणन रिसोरुहरुकरिवरदंतहिं पणमसमितपणशणहोगा काविसणाहहोडश बापकाविलणजाणवितपुयायह प्राणियपासिपरहिणिहाणहे पार्टअजाणवेधपुदिष्प असिवणुप्रासामुलचिन्न कादिङवासखबरियका उपायहहामहारथक्कल कवि सचिवाणिवरिणहारी रयणकाडिमार्यगहोकरी लश्यासिडपिणुदाहिविवाहिं सपकिणकिया पडसमहहिछिनछिमारिविपक्कएउवसामान मेलेविससरुसगमणजयवरसंथारश्काविसमा काविधारसणार यासुजामिणीगमण दिणमणिसमग्नमण सेराणिणाहाकमजयबिम। संग्रामुकरण हाई जममुटरमहा हरियंदाहाइंगजियम गादिसिधवरगावाहियाहाहासपहजो। हाचलसिविंधाधलायमा किल्लिकि लियेनिसियरइंजिगिजिगिश्रशसिबरईकपिया धनग्नासेमाईलमानासंदणवस्याबाहवा) समहराणासिरलुप्तमा करिहरिहतस्या हे कापालिक, पट्ट से अलंकृत शिर के लक्षण क्या देखते हो, तुम मेरे लिए निर्दय और दुर्विदग्ध हो। जिसे घत्ता-शत्रु को मारकर, फिर बाद में शान्त होकर और सर (तीर) सहित धनुष (शरासन) छोड़कर मैंने स्तनों से चाँपा था वह उर गजबरों के दाँतों द्वारा अवरुद्ध है।" कोई प्रणय से स्निग्ध प्रणयिनी के लिए कोई गजवर की तृणशय्या पर मरकर संन्यास ग्रहण कर लेता है ॥ ३५॥ यान स्वरूप अपने प्रिय को बीणाओं को खण्डित कर देती है। कोई कहती है कि शरीररूपी स्तम्भ समझकर, बह शत्रुओं के द्वारा नृप श्रेष्ठ के पास ले जाया गया। स्वामी ने उसे आँतों से बाँध दिया और कटारी से सिर फिर रात्रि के जाने और सूर्योदय होने पर जय के लिए संघर्ष करनेवाले नगाड़ों के शब्द होने लगे। यममुख काट लिया। जिसने अपने कठिन पाश से शत्रुचक्र को निमग्न कर लिया है ऐसा कोई मेरे रथ के ऊपर स्थित की तरह रौद्र, हरिचन्दन से आई गरजते हुए हाथी, हिनहिनाते हुए अश्व, हाँके जाते हुए रथ समूह, सन्नद्ध है। किसी ने राजा के ऋण को दूर करनेवाली हाथी की रत्नावली अपने दोनों हाथों से ले ली, बताओ समर्थो योद्धा, हिलती हुई पताकाएँ, चमकती हुई तलवारें। धरती के अग्रभाग को कैंपाती हुई सेनाएँ भिड़ गयीं । तब के द्वारा यहाँ क्या नहीं किया जाता? युद्ध में समर्थ एक और रथ पर बैठे हुए, मनुष्यों के सिर काटते हुए, हाथी-घोड़ों को मारते हुए, Jain Education International For Private & Personal use only www.jaine5330g
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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