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________________ राघवा संकेश्यनित्रकंपयोषा एवाणिहालिनवालए अवमाणेवितमाश्यतणनघणरतपुर जम्मालएरोसचिमासहजयकासासद शनिवसपाहदाहपिपिसण समरसिडेपिणा सिरामिण धिपखंडरिणवामहरिसविनसडयक्चिना पळपाक्तिन कलङ्कहसिन सतहो। लासिउं तपिरणमिण करमनलेणिय पिवहोपवप्पिणु दविहसणिण कामणिण णिहुछि। समईचवमहामपुरकापाकाचविजीणा मायन्नापासमवहाणा जाग्वचिंताडकेतन प्रामणासना निंदासुनी सजविरती अपहारही पाडावसवि जगपकनरवि साकरिकरखअसरदे।। सरसुत्रा नालिंगि गोलरमिजएहपउना घरकुलमचा उद्दालतई जसुमलतहणाउमुझंत हिमपाहेजसह शेजयणियवशश्हपालग अवर्येणारा चहकिसीसज्ञायता ससिदिपायहजार लहरुजलजल गयणुमहाबलवानवि अपजीचित्रकारांधुनमुणादिसुंदरखनहताविक श्रणवतपाअहवाणणविखुकुलेषणविधालापीपावलझ्मसनवरतपरिणहिप्पर हिमवन जरुरापावलिणाडापयामदणदत्तात्मवण्यासनमासघाए मङलघावजाचश्ताघासा। पारुडजसमध्यावशयारकहतदाउपविल पंधएणसितमधूमनु यचकित्रिपडिलवरविर काजश्यहावीरपतहावडउजश्वद्ध कणिवश्लएणचवक्किल जपणेजलहरसरजनकोकिला २६९ घत्ता-राजा अकम्पन ने पुत्री की ओर इशारा किया। इसलिए बाला ने इसकी ओर देखा । तुम्हारा अपमान इहलोक और परलोक की गति अवश्य नष्ट होगी। तुम्हारे द्वारा क्या कहा जा रहा है ! कर चाचा के पुत्र मेघेश्वर ( जयकुमार) का इसने सम्मान किया॥२१॥ पत्ता-शशि-दिनकर-जलधर-अग्नि-जल-गगन-धरती और पवन, तुम और तुम्हारे पिता, हे सुन्दर! जनजीवन के कारण हैं, इसे तुम निश्चित रूप से जानो।॥२२॥ इसलिए क्रोध से भरे हुए दुःख की इच्छा रखनेवाले दोनों ही दुष्टों- जयकुमार और काशीराज अकम्पन से युद्ध में भिड़कर, सिर काटकर सुन्दरी को इस प्रकार ले लिया जाये जैसे कामपुरी हो। विद्वानों के द्वारा २३ निन्दनीय, उसके द्वारा कहे गये कलह के उद्देश्य की राजा ने भी इच्छा की। यह सुनकर, राजा को प्रणाम धनवान् के द्वारा अथवा दीन के द्वारा, अकुलीन के द्वारा अथवा कुलीन के द्वारा स्वयंबर में ली गयी कन्या कर, थोड़ा हँसकर, कार्य छोड़कर, अपायबुद्धि महामति मन्त्री कहता है - "भूख से क्षीण, कोप से विलुप्त, का अपहरण नहीं किया जाता। इससे हृदय भारी पाप से लिप्त होता है। यह मार्ग तुम्हारे पितामह (ऋषभ), मान में ऊँची, भय से खिन्न, उन्मत्त दुःख से सतायो हुई, निद्रा में लीन, गमन में आसक्त, स्वयं ही से विरक्त, तुम्हारे पिता (भरत) और मनुसमूह ने प्रकाशित किया है। इसका उल्लंघन कर जो प्राणियों को सताता है दुसर में अनुरक्त है । हे विश्व-कमल के रवि, भरतेश्वर पुत्र, प्रकट वेश्या के समान, सँड के समान हाथोंवाली, वह मनुष्य अपयश और दुर्गति को प्राप्त करता है। लेकिन यह सब कहने पर भी युवराज अर्ककार्ति प्रतिबुद्ध उसका आलिंगन नहीं करना चाहिए: उसके साथ रमण नहीं करना चाहिए। यह परकुलपुत्री कही जाती है। नहीं हुआ, उलट जैसे आग में घी डाल दिया गया हो। वह विरुद्ध होकर कहता है कि "जब उसे वीरपट्ट इसे उड़ाते हुए, यश को मैला करते हुए न्याय को छोड़ते हुए, कुमार्ग में जाते हुए. हे युवराज! तुम्हारी बाँधा गया, और जब नागराज भय से चौंक गया था, और पिता ने मेघस्वर को 'जय' कहकर पुकारा था, Jain Education International For Private & Personal use only www.jain521 org
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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