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________________ म्यसमाविकरुवससरहंस राजपहुनुय्यमनरनाङसोसाना मछिंदुहजिणवंदहतियरपाई मणसाव्ह अमरनपासुनरतणुगडगुणमोखविपावहानाडामखणामवासिगिह आहारमारि रससामगिडानयम्मिचठलए सहविविकपणुजयउपस्त्रिवलकडिलणहहाम्रपदेउदिवासह मश्वरक मसाजामससादिवशकणरविसुदाइविजमानाश निहिलाद ग्रहमिदसाइप ऊंजेविजानना सरक महसनल सहिडविनिरल पाश्वतणचमुवासाच रूमअयए। हाथरुयरूपमबख्यकत्रकंयपरिहिपाढ़ गश्वरदेठधुपुराउपाद सबछडमड़तणजमा छ। एण्पडमनवमहसष जोईतासरूमदासमति रुजवलरमाणअमियकतिजावण जामउकपायाङतियस प्राण्डमामहोपविसवसङउचढमहिपक्चविसाला सुपुसमहाबाहा धरितिमाहाशा गवदामबहही गडहर्मिदसील ऊसुबबालपसमिस्तकलि केलिसाज्ञ बुहाराजारामपुरोहिउसमिनाङमहा करमणुअपार्दपवलअमरूधणमिवुनुपनिडप हाण विग्रहविज्ञपटमठाणासुपरविमहागाविसमा सबछसिदिसंबईला सामरविभ हारनंतविझा उपयुषचजावससद जोत्रासिमप्पियनसाय हायविघग्घुमुणिचलणतीषु कुरुमाएससोचितगयखावरदनुनहिलकमलपखापसमखरुजलविजययठात्तबच्चरणखान्या वहाँ से अवतरित होकर, वह कुरुवंशरूपी सरोवर का हंस यह राजा श्रेयान्स उत्पन्न हुआ। राजा का मन्त्री था, कुरुभूमि का मनुष्य नाम से अमितकान्ति। जो फिर कनकाभ नाम का देव हुआ, आनन्द घत्ता-इसलिए तुम मल नष्ट करो, जिन की वन्दना, करो, तीन रत्नों को मन में ध्यान करो। अमरत्व नाम से अपने अधीन था। वहाँ से च्युत होकर पहले वह राजा महाबाहु धरती का स्वामी हुआ। और सु-नरत्व को तो ग्रहण ही नहीं करना, मोक्ष भी प्राप्त करो॥८॥ पत्ता-फिर वह इष्ट सर्वार्थसिद्धि गया। फिर अहमेन्द्र शरीर नष्ट होने पर, कलह को शान्त करनेवाला यह बाहुबलि तुम्हारा भाई केवलज्ञानी हुआ॥९॥ जो आहार और नारी के रस के स्वाद का लालची राजा था, वह चौथे नरक में कष्ट सहकर चंचल और कुटिल नखोंवाला व्याघ्र हुआ। फिर देव और मतिवर नाम का तेजस्वी मनुष्य, फिर दिव्य दृष्टि ग्रैवेयक का आडम्बर को शान्त करनेवाला जो राजपुरोहित था वह कुरु मनुष्य प्रभंजन प्रबरदेव, फिर धनमित्र, फिर देव। फिर पुराने जन्म का भाई सुबाहु, फिर निखिल अर्थों का देवता अहमेन्द्र हुआ, जो वहाँ सुख भोगकर सुखप्रधान परमस्थान में अहमेन्द्र हुआ। फिर महापीठ होकर भी, सर्वार्थसिद्धि में देव उत्पन्न हुआ। वह मरकर यहाँ मेरा पुत्र भरत हुआ है। लो तुम भी शीघ्र ही पापरहित होगे। जो प्रीतिवर्धन नाम का सुगुण सेनापति मेरा अनन्तविजय नाम का पुत्र हुआ जो जीवों में सदय है । और जो उग्रसेन था, वह मरकर और बाघ होकर था, कुरुभूमि का मनुष्य प्रभाकर नाम का प्रसन्न देव, फिर हतपाप और ऋद्धियों से प्रौढ़, अकम्पन, फिर मुनि के चरणों में लीन होकर कुरुभूमि में चित्रांगद मनुष्य हुआ फिर कमलनयन राजा वरदत्त हुआ। फिर ग्रैवेयक देव, फिर पीठ, फिर सर्वार्थसिद्धि का इन्द्र, फिर यह पापरहित मेरा पुत्र वृषभसेन हुआ। जो पहले अच्युत स्वर्ग में विजयराज सामानिक देव हुआ। Jain Education Internations For Private & Personal use only www.jain.501org
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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