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________________ गाउमा कपाल आयलपराहादेवचनुपाख सुवमंतिम्रोहिय करुमिहमपुयायपीणनुयाणाणाहरणटिसोदिया।सामुउमंतिकव्हा एघाउमाणकण्याक्षणामकेवणविमाणे मप्यमसुरुश्माणसन्नविरियावविद्धमाणिकमग्न सासयवासवपपजण जायसराचरुगलियसकसणाणिपहायरूपहघरताडदादहादा निदावियदियते चवारिविणिबजेविडियसेव देवचक्षुपारखारदवापश्चश्मृणुयाज। याहासामागसपाहतोत्र महलदेठसिरिमा अरमायरसणुवलयुमपनारमश्वरूमश्वा स्वहमतिराय कोपावणमहोतणियछायातायपहासरूमविदेठ अजवहानकपणुमनुजान सपावरतेउतिचतेउ परवलहोसमयमुधमकर कयायातियसुखठकहहिणिउसयाकनिया पंतमहिंजणि जोपकवणसदिमसहिवाणंडसोहिउविमलवुद्विशता अमरूपजणठे रंग जियजण्ठ ससिटविमाणहोचाय दनयवाणिवणा विस्यरश्णाधणानन्दसुनजामजाखा धणमितसहिकलणलिणमिव किंकरुश्रधाचपरममित एयरकवडसिहमाईमसर नाउसमागमा शाखश्चनक्किरसमरसीम सिरिमाणीसाहासीमाणिमुपविलवायलिविर सियारावाजणवरणचितेविथियाईपुणुलपराउत्तयवतविमल सहलकालगायतनाउला चन्नाशिवमरडेनसरति श्रतिनिसलनवणेचरीतामउसकलतिनउजलपियातणावमाणाखुदा और कुरुभूमि में स्थूलबाहुबाले और नाना अलंकारों से शोभित मनुष्य हुए ॥१६॥ से उत्पन्न होकर यह सुभट शुद्धि प्रदान करनेवाला विमलबुद्धि आनन्द नाम का पुरोहित है। १७ पत्ता-जनों का रंजन करनेवाला प्रभंजन नाम का अमर (देव) रुषित विमान से आकर रति में आसक्त कुरुक्षेत्र में आयु का मान समाप्त होने पर मन्त्री मर गया। विविध माणिक्यों से चमकते मार्गोवाले ईशान दनक सेठ की पत्नी धनदत्ता का पुत्र हुआ॥१७॥ स्वर्ग-स्वर्ण के विमान में कनकाभ नाम का देव हुआ। शंकाहीन पुरोहित का जीव प्रभंजन नाम से रुषित १८ नामक उत्तम विमान में देव हुआ।सेनापति प्रभाकर नाम से दीप्त दोप्तिबाला दिशाओं को आलोकित करनेवाले श्रेष्ठीकुलरूपी कमलों के लिए सूर्य, धनमित्र तुम्हारा अनुचर अथवा परममित्र हुआ। स्नेह से बंधे हुए प्रभा विमान में उत्पन्न हुआ। हे देव, बे चारों ही तुम्हारी सेवा करनेवाले स्वर्ग में तुम्हारे पारिवारिक देव थे। ये छहाँ तुम लोग स्वर्ग से आये हुए हो। इस प्रकार राजा, युद्ध में भयंकर चारों अनुचर और सौभाग्य की वहाँ से च्युत होने पर तुम जहाँ जिस प्रकार उत्पन्न हुए, उसी प्रकार ये भी उत्पन्न हुए। हे देव! सुनिए, शार्दूलदेव चरम सीमा रानो श्रीमती अपनी भवावली सुनकर विस्मय में पड़ गये। छहों जिनरूपी सूर्य के गुणों को सुनकर ओमती के पुण्यप्रवर उदर से सागरसेन नाम का पुत्र हुआ। मतिबर, तुम्हारा श्रेष्ठ मतिवाला मन्त्री हुआ। हे.. स्थित हो गये । राजा फिर से कहता है-ये भयभीत तथा विमल सिंह-कोल बन्दर और नकुल ये चारों मनुष्यों राजन् ! इसकी छाया कौन पा सकता है। हे तात ! प्रभाकर देव मरकर आर्जबा रानी से अकम्पन नाम का से नहीं हटते, यहाँ बैठे हुए हैं, बन में विचरण नहीं करते, न कुछ भोजन करते हैं, और न पानी पीते हैं, पुत्र हुआ। सेनापति, तुम्हारा दिव्यतेज सेनापति हुआ जो मानो शत्रुसेना के लिए धूमकेतु के रूप में उत्पत्र अपना मुंह नीचे किये हुए तुम्हारा हुआ है। कवियों के द्वारा कहा गया है कि कनकाभ नाम का देव च्युत होकर श्रुतिकीर्ति और अनन्तमति Jain Education International For Private & Personal use only www.jainelibrary.org
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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