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________________ मथणुकायजरा दिहासयनरणाहहोकगणगंगाणदेजवणाराशेणकामहमिल्लियसलसंत नियडेनिसमासातरलकिहे रिसजमलीलाश्वलबिहाकरणियकरणिजिम्करुममियावद्धिगणवं बेनिवलिंगिया मळरानुविवपाणिवेसिया इसिएकलहंसिवसंसासियमुहरायणजिसहनियछिन। कञ्जताविणिवकपश्यहिंाना विधसिएकदिड देकविलिहिउ पजतमिश्दोश्या पवनहमिया मसरविथिट वासबद्दताध्याशा पञ्चश्मयलदेवानजावरू माणसाहसदाकटसरू सागवाम्मलण पसिडसह सांगजवश्यणहंजीवियहरू सार्णरइरसणिलयदीसायका साणवहसुहकमलदिवायला सम्वविलासपसारित सार्णकंतिकोसवहारिनसोपविजाबाहादळारिसाणचस्पजश्वयारिन साणयुमडवयारिख साणेसूहलमकमणिला वजोवनहविश्राईतावश्युतिमहासिहरहाई दलायो देविषयाटिणजिपवरखासहाफपहि। श्रीमतीवनात राजावागाह महाससंकासहामावरंदरणकेलासला दिया। तावानीकथना ईरलसियडेसनलेपिण तेणयविणिमकरमा लेप्पिणु वैदिउनिणुसुहवनिणवजिट वंदिलजिए। काम की उत्कण्ठा उत्पन्न करनेवाली राजा की कन्या को देखा। (वह उससे इस प्रकार मिली) जैसे यमुना नदी गंगा नदी से या श्रुत-परम्परा कवि की मति से मिली हो। चंचल आँखोंवाली उसके पास वह इस प्रकार जो वर सबसे बाद में आया वह मानो सौभाग्य का घर था। वह मानो कामदेव के द्वारा प्रेषित तीर है। बैठी जैसे लक्ष्मी के पास पुरुष को उद्यम लीला हो। हथिनी के द्वारा हथिनी से जिस प्रकार कर (सैंड) माँगी वह मानो प्रेमरस के जल का समुद्र है। युवतीजनों के प्राणों का अपहरण करनेवाला तीर है । वह मानो तुम्हारे जाती है, उसने हाथ माँगा, जैसे एक लता दूसरी लता का आलिंगन करती है, उसी प्रकार एक ने दूसरी का मुखरूपी कमल के लिए दिनकर है। वह मानो प्रसारित रूपबिलास है । वह मानो बहुत बड़ा कान्तिकोष है, आलिंगन किया। मस्तक में चूमकर सामने बैठाया। जैसे कलहंसी कलहंसी से बात करती है उस प्रकार उसने वह मानो विस्तारित विद्यानिधि है, वह मानो अवतरित पुण्य-समूह है। वह सुभग मेरे मन को भाता है और सम्भाषण किया। मुँह के राग से कहा गया उसने सब देख लिया, फिर भी राजकन्या ने कार्य के बारे में पूछा। जो तुम्हारे आठों अंगों को जलाता है। जिसके बड़े शिखर हैं और जो दुःखनाशक हैं ऐसे जिन मन्दिर की घत्ता-उस पण्डिता ने कहा कि तुमने जो चित्रपट चुपचाप लिखकर दिया था मैं उसे वहाँ ले गयी कि उसी प्रकार प्रदक्षिणा देकर कि जिस प्रकार फेन हिम और अट्टहास के समान कैलास पर्वत की इन्द्र देता जहाँ दमित्त वासव दुर्दान्त आदि हटकर रह गये॥१॥ है, रति से विकसित अपने मन को मुकुलित (बन्द) कर तथा अपने दोनों हाथ जोड़कर पुण्यहीनों से दुर्लभ in Education Intematon For Private & Personal use only womja-4559
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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