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________________ यररिसिसामीटगदासोपवणानिदजीवगादासश्सबलताखजरासंतपाजपाजयुपरिणव शर्तकारएकालमहानिवशता जाहिंधहसंधुढगयणयलागश्चमुसहकालिफड़हाश्य श्रहामुधिरत्रणहो परमेसगिउरिलाधव मानलघुहारनिवसर्जजनिवसत्यर्ण तदि ताहिकहमिननपरभक्तेजाजषाण कारणेता विपुजीवंयोगलुकिहतसशविण्जावेंपोग्नलकि जिनशविणुजीवंयोगलुकिरम विष्जायोग्नलर्किसमशविणजापोग्नलार्कजिय विजावा पानखकिणिक विजापानखविण किंवहनवयणागकणसातव्यदस्यिवियसि यदि अणजनयुदयशिवसयदि जन्जारजेपवश्वाहहिहि तीविषुपनपणननिमारकिदजो| पंचपदासजवणवितहोकवणुसाउकिरकवणविजचिनियमतदाङगश्ताचितिगपूर किलदालिहिवरकएकिंमहलायणचितविधकिन्नकरइकोजापश्सासिनकण विहायागर, मुणवर्कवूखुमुरिसजिद सिद्ध होर्किजण्यसनवज्ञतवताकिंत्रपठखवविवादिश्वद्यालय वणिमणेविमुणियरिंचवाघना चितवदोलेहाणिजियहो चितालिहणुणसंसाठाश्व दबिदियसादियहिं जाएंजाइनिरुत्तठयाडवा जोजाप्छसपनि हिपसासोजश्पयहा तास पियामहरसमपिनाममन्तमपणादिहताला जश्सोझिनहिताचडमत्रणा चिम्मन्नहोकहिवन्नााणु मतिसागर ऋषि के पास गये। राजा ने उसने जीवगति पूछी। मुनि उसे सब कुछ बताते हैं। जिसके रहने से विकसित ने कहा-यदि जीव ही देखता है और कथा कहता है, तो बिना आँखों के वह क्यों नहीं देखता? जग परिणमन करता है, हे महानुपति, उसका कारण काल है। जो न आते हुए दिखाई देता है और न जाते हुए उसका कैसा भाव और कैसी छवि? यदि चिन्तामात्र से उसे घत्ता-जहाँ वह काल विद्यमान है वह निश्चय से आकाशतल है। गति का सहकारी धर्मद्रव्य है और कुगति होती है, तो वह चिन्ता क्यों करता है, अपनी कामना पूरी क्यों नहीं करता?' दरिद्र' भूख से क्यों मरता स्थिरता का स्पष्ट कारण अधर्मद्रव्य है। ऐसा परमेश्वर ने कहा है ॥१४॥ है, वह चिन्तित किया गया भोजन क्यों नहीं करता? कौन जानता है किसने क्या कहा है? आगम नव कम्बल पुरुष (नया कम्बल या नौ कम्बल) के समान है। सिद्धान्त के लिए लोग गुरु को प्रणाम क्यों करते हैं? तप के ताप में स्वयं को क्यों नष्ट करते हैं? क्या दूसरा मार्ग नहीं है? यह सुनकर, मुनिवर कहते हैंपुद्गल द्रव्य अचेतन होता है, हे नृप ! जो-जो सचेतन है, मैं तुझसे कहता हूँ कि वहाँ-वहाँ वास्तव में घत्ता-जिस प्रकार लेखनी से रहित चित्रकार का चित्र लेखन नहीं है, उसी प्रकार जीव द्रव्येन्द्रियों और जीव ही ज्ञान का कारण है। बिना जीव के क्या पुद्गल त्रस्त होता है? बिना जीव के क्या पुद्गल हँसता है? भावेन्द्रियों को निश्चित रूप से जानता है ॥१५॥ बिना जीव के क्या पुद्गल रमण करता है? बिना जीव के क्या पुद्गल भ्रमण करता है? बिना जीव के क्या १६ पुद्गल जीवित रहता है? बिना जीव के क्या पुद्गल देख सकता है? बिना जीव के क्या पुद्गल सुनता है? नेत्रों के द्वारा जो जो नहीं देखते, यदि वह-वह पदार्थ नहीं है, तो हे पुत्र ! अपने पितामह के पितामह को क्या वेदना से विद्ध होकर चिल्लाता है? इस पर पृथ्वी और राजा की श्री का अनुभव करनेवाले प्रहसित और तुमने नहीं देखा। यदि वह भी नहीं है, तो फिर तुम भी नहीं हो, चिन्मात्र में वर्णादि गुण कैसे हो सकते हैं, Jain Education International For Private & Personal use only www.jainelibrary.org
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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