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________________ करजमुनिसंतापदो इंदिरायसरि म जापवणि द्वाण हो ॥ १०॥ चवलयरक्क सासुणवस चरति मडवाश्वाचिणु हति मरण व्हर्किकरकिंकरति मायंग चंग किमो खुदेति खिम्म लमश्राय होरहरति । एवरविजातेरुडजेह रोवश्वश्वस होणररक कुई सवपासर्वधमुहिबंधु पियरु खुपाघें सिणयरुगंधबणियरु धणु दूधपुलोदचासणासु घरुविग्घरु केवल सणास फणिसेोउवले| उपजणि श्राको सुवि कोसविवापि इक्कियविरामि खयरवश्यत्रतवगण मिसा दासपुहास मेलमा किं कखश्पा किंछत्रलिन्नायारभूमि पाविनाशविजउजर्हिण का मिचा मरुमरुदेश्ण भरण हारि एसमंति के कास के उधारि पलियकिय सासु ससुदोश ओमुणिदि मृदु सोजा यमप्यपेविराणपण एमेहर्दिधाराजल चारसहिं हरहुमदावल ह। श्रदिर्सि वेविसा सिसिरिकलसहि जंजय जयसवडु पहु तेषुरुमेदेविधार पम म णिसापुणिवसपपरिहावि घिउ जिणे व जिरिकले वि जोनिंदरसिंचंदणेण विध इसरेमममणेण जो थुप्रो विनय देश दहिंमिसमापक परमजाई मामतमति लड सेवाणिज्ञ पत्रदेवितासुसु कर श्रज्ञ देवगर्हिविविइर्दिपरिहणेहि चोहरण हिंमणिकंचणघणेदि १७५ " अपनी परम्परा में तुम शान्ति स्थापित रखना। तुम राज्यश्री का भोग करो, मैं अब निर्वाण के लिए मुक्तिरूपी शिला पायी जा सकती है कि जहाँ पर विद्या की कामना नहीं रहती। मरणधारी को चामर भी हवा जाऊँगा । " ॥ १० ॥ नहीं देते और न केतु और कामदेव शमन करते हैं। बाल सफेद होनेपर शिष्य नहीं होता, जो मुनियों के प्रति मूढ़ है, वह खोटी गति में जाता है।" बत्ता - राजा अतिबल ने यह कहकर, धारावाहिक जल की वर्षा करनेवाले श्वेत श्रीकलशों से अभिषेक कर, महाबल को राजपट्ट बाँध दिया ।। ११ ।। ११ चंचल लोग, कुसासणवश ( कुशा / कोड़े के शासन के वशीभूत) होते हैं, (दूसरे पक्ष में चार्वाक आदि दर्शनों के खोटे शासन में चलनेवाले होते हैं)। मेरी वाणी कुवादियों का हरण करनेवाली है। (दूसरे पक्ष में, मेरे बाजि कुवाजियों का अनुसरण करते हैं) जरा और मरण के लिए अनुचर क्या करते हैं, हे पुत्र! क्या हाथी मुझे मोक्ष देते हैं? निर्मलमति राजा के रथ रह जाते हैं, परन्तु ये और दूसरे जग में अशुभ होते हैं। अन्तः पुर अन्त:करण में आघात करता है। वह रोता है परन्तु यम से रक्षा नहीं करता। संसाररूपी पाश का बन्धन सुधियों का बन्धनसमूह गन्धर्वलोक की तरह एक क्षण में ध्वस्त हो जाता है। नाग के फन की तरह भोग भी भोगने योग्य नहीं हैं। आक्रोश और कोश दोनों ही परित्याग करने योग्य हैं, देश को मैं दुष्कृत के उपदेश के समान मानता हूँ, और विद्याधर की प्रभुता को तृण के तुल्य समझता हूँ। सिंहासन को मैं 'हा' इस स्वन ( शब्द) को करता हुआ समझता हूँ क्या वह क्षय को प्राप्त हुए प्राणों को बचा सकता है? क्या छत्रों से Jain Education International १२ जब जय-जय शब्द के साथ पट्ट बाँध दिया गया, तो राजा नगर का परित्याग कर चला गया। मणिमय आभूषण और वस्त्र छोड़कर वह दीक्षा लेकर निर्जनवन में स्थित हो गया। कोई उसे छेदे या चन्दन से सींचे, सर से बेधे या मन से माने, कोई स्तुति करे या दुर्वचन कहे, वह परयोगी दोनों में समान रूप से स्थित हो गया। यहाँ पर सामन्त, मन्त्री और भटों के द्वारा सेबनीय उसका पुत्र राज्य करता है, देवांग विविध वस्त्रों, मणिकांचन से सघन अलंकारों, For Private & Personal Use Only www.jain389.org
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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