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________________ यलविवहत्तणयामश्यलेहाहोहिंतिकश्करहलहरहरिपडिसबुक पठसाबलवियाकहिय रमजाना ताणवजलश्वरणि कदमहामणि सणसुमृतमुठिाशकिउदियमा सप एमविहसप कालेहोसम्वक्तिनाद्वायतकाईकिल्यावमल मारप्पिणुमयखाहि तिषलु रमिहितिजकाल एसपिविहिं। तिसामवाणमडर लादतियाहिणिप रघरिणापहोददितिविणियतरुणि ण नासहितिपिचमकाविहासिदितिणिया पाणिवद्ध कहिहितिधम्माजकरशसात तरष्टाचकवर्वात निकम्मरन्तरशस्तूणागारदवसानलहं अब बादीधापति वामण निहित रूविपावधहरामलाई सणिहितिकालकमुम्बा पणछाक जदिकिंवम्मिमिडबिठाततसिणिहिति गादेवलजलासणिहितिखट्व टपवणावणसमदेवयजलदेवमाशेलपिहिलिपट्टी यो।। घत्ता-तब नवमेघ के समान ध्वनिवाले महामुनि ऋषभ कहते हैं- "हे पुत्र, तुमने जो पूछा है वह सुनो। तुम्हारे द्वारा निर्मित द्विजशासन समय के साथ कुत्सित न्याय और नाश करनेवाला हो जायेगा"॥९॥ १० "हे पुत्र, पापकार्य क्यों किया। ये लोग (ब्राह्मण) पशु मारकर उसका मांस खायेंगे। यज्ञ में रमण करेंगे, स्वच्छन्द क्रीड़ा करेंगे, मधुर सोमपान करेंगे। पुत्र की कामिनी परस्त्री का ग्रहण करेंगे, और दूसरों के लिए अपनी पत्नी देवेंगे, मद्यपान करते हुए भी दूषित नहीं होंगे। हे राजन्, प्राणिवध से भी वे दूषित नहीं होंगे। वे जो करेंगे उसी को धर्म कहेंगे, और वह भी उसी कर्म से तरेगा। शून्यागारों, वेश्याकुलों और भी पापों से अन्धे राजकुलों के कुलकर्मी को जहाँ धर्म कहा जायेगा. हे पुत्र वहाँ मैं पाप का क्या वर्णन करूँ! वे गाय और आग को देवता कहेंगे । पृथ्वी और पवन को देवता कहेंगे, वनस्पति को देवता और जल को देवता कहेंगे। Jain Education International For Private & Personal use only www.jainelibrary.org
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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