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________________ इंसासपालिलियतदारपुरारामगामसामसर दिमाताहणयादरशाधतामहिकम णखमाधवविक्षिणी विहाँजणतण्डा तिहतिहणविजश्यविदिलशापहिलाये। वज्ञणिहाय पहिदिणेस FropLIRON शाश्मणहर परपाणि (सपूछिमपहा रेदिहियक्ति लरथचक्रवार सरथक्कवत्रि यसिविणावलि किसासगिरिप वझावलोकि यागामिदोर वतादिनाथ संडलिवमिलि वंदनावरण यसंपदायका गठसजियटाकेलागापाजणजियन संथलपमेयरूपरमपसजिपलचिंतामणिमरता रु कसुरसुरसायपुत्रमयमा कममरकेटरपोलबजाखडंकामधणुअरकीपाणिहिबचार और शासन के द्वारा लिखित अग्रहार नगर दिये गये। आराम, ग्राम सीमाएँ, और सर राजा के द्वारा प्रदान किये गये। घत्ता-आदिजिनेन्द्र के पुत्र भरत ने ब्राह्मणों के लिए कृषि से रमणीय भूमि और बैल (गाय) इस प्रकार दिये कि जिससे कि वह नष्ट न हो, और इसीलिए आज भी समस्त राजसमूह के द्वारा दान दिया जाता है॥७॥ दूसरे दिन अपने शयनकक्ष में राजा ने रात्रि के पिछले प्रहर में एक अशुभ स्वप्नावलि देखी जो आगामी दोषयुक्ति के समान मिली हुई थी। प्रात:काल वह सज्जित होकर गया और कैलास पर्वत पर जाकर उसने ऋषभजिन की पूजा और स्तुति की- 'हे परमेश्वर परमपर जिन, तुम चिन्तामणि और कल्पवृक्ष हो, तुम अमृतमय सरस रसायन हो, युद्ध में लब्धजय तुम कामदेव हो, तुम कामधेनु और अक्षयनिधि हो, Jain Education International For Private & Personal use only www.jainelibrary.org
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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