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________________ सोगरवाधरण विरमणुपदंडासिवठा साविद्यानजेहिडिणलासिमला । सामाश्रयासर डाप्रतिहियरि। सङ्ककामकादा परिहरणे किन अहिंसमलाही पवरधरलाहस समासणार पोधातलरहेवि तरथचक्रवात सरथक्कचाता प्पपरिहविय क आवायनिर्मा मंत्रीश्वस्पक्छ रमठेलेविसमि मिन। न। रणयावियानव चीखदाकरिधधरु ईसणदघल्लिलाकुसरुवमतिणिववियदासिसरसाम्राश्यहयुपुतिमिसरपोसहवंत २८५ भोगोपभोग की संख्या निर्धारित की है। अनर्थदण्ड के आश्रय से जिन्होंने विराम लिया है और जिन्होंने जिनेन्द्र भगवान् द्वारा भाषित का विचार किया है। घत्ता-सामायिक, प्रोषधोपवास, अतिथिपरिग्रह तथा काम-क्रोध का परिहार किया है ॥४॥ ऐसे उन ब्राह्मणों को भरत ने प्रतिष्ठित किया, और हाथ जोड़कर सिर से नमस्कार किया। उन्हें यज्ञोपवीत का चिह्न धारण करनेवाला बनाया। सम्यग्दर्शन धारण करने पर एक व्रत, पाँच अणुव्रत लेने पर दो व्रत निरूपित किये गये, सामायिक से युक्त होने पर तीन, Jain Education International For Private & Personal use only www.jaine369
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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