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________________ इरश्कादश्वकरमिलादिड्डहुपाविहुच पाडणमहाउतकदेखल्लासता गहिणिगलगा महाशिलयकामहो मङ्कमपतल्लियरिङमझदिवशसहप्रायनघतवणुपवाहाका कड़शा किकिश्थरकामण्णा किसक्पावधरिसखयणकलस्तष्पाकाषनवणासमयणावा किकिराणतणावधिविजाहरवरभिरणाणिविमणसमयक्निरणाघरणिलरधरिपूरयणाका लहदविण्यझारपण सारयणीजासासविफरियासार्कनाडाविश्वरिय साविज्ञानासपरुविधा यशतजमिवयजायतेखहनुहहि महरियातमिन्नपजविकरमस्मिानधाउच दिणिजदिणि मुरविधिमउविहरीयाणा यता सासिरिजागणणामांगुणतजेगय गुणों हिचिवस्याडरिमन गुणितमन्तमि पुणश्वममिाजेहिंदीणुनहरिमठावाश्यचितिविगएंक्षा विणगादकारिदियणाणाणिवशतेश्राश्यसचिलधमथण जनायकिणगणमुहमण तयणय रिकसण्यासिखं सामवायणनकरयं तरुपल्लवपिहियेपंगणय णवपासिरिदिणालिंगगना चतिनविण्यागिहिणो परिपालियसावविक्षिणो कमजर्मितसंततसक्ष्य यरताविरवाला सवामविया पादिनकर्दिविसमिहिमा पठणकलनुणिमछिटठ दिमनपिटाजोपडियन याघरसंगपमाणुजेहिंगदिन स्यणासायणाविरश्यदिदिसिविदिमागमणमाणकरण सागाव बेर ४ अपने मन में पीड़ित होता है कि हे दैव, क्या करूँ? लोभी, दुष्ट, पापी और चंचल वह अतिथि को उत्तर पत्ता-लक्ष्मी वही जो गुणों से नत हो, गुण वे जो गुणियों के साथ जाते हैं, चित्त वह जो पापरहित होता देता है है। मैं गुणी उनको मानता हूँ, और बार-बार कहता हूँ कि जिनके द्वारा दीनों का उद्धार किया जाता है।"॥३॥ घत्ता-घरवाली गाँव गयी है, काम की इच्छा रखनेवाला मेरा मन जैसे भाले से भिद रहा है, मेरे सिर में पीड़ा है, तुम घर आये हो, बताओ मैं इस समय क्या करूं? ॥२॥ धन की गति का इस प्रकार विचार कर राजा ने अनेक राजाओं को बुलवाया। वे आये जो धर्मधन का संचय करनेवाले और योगक्रिया समूह से शुद्ध मनवाले थे। जो गुणों की परीक्षा से प्रकाशित हैं, जिनमें बूढ़े कामुक व्यक्ति से क्या किया जा सकता है? पापी पुरुष के द्वारा सुने गये शास्त्र से क्या? लज्जा से सजीवरूप बीज नित्य अंकुरित हैं, जो वृक्षों के पल्लवों से आच्छादित हैं, ऐसे प्रांगण को, कि जिसका मानो शृन्य कुलीन पुत्र से क्या? बिना तप के सम्यक्त्व से क्या? उदासीन विद्याधर और किन्नर से क्या? घमण्डी बनश्री ने आलिंगन दिया है, जो विरक्त गृहस्थ नहीं राँधते, जो श्रावकों की व्रत विधि का परिपालन करनेवाले से क्या? धरणीतल के छिद्रों को सम्पूरित करनेवाले, लोभी के धन के बढ़ने से क्या? रात वही है जो चन्द्रमा हैं, जिन्होंने त्रसजीवों के प्रति दया की है, जो दूसरों को सन्ताप देनेवाली झूठ बात से विरत हैं, जिन्होंने नहीं से आलोकित है, स्त्री वही है जो हदय से चाहती हो, विद्या वही है जो सब कुछ देख लेती है। राज्य वही दिये गये को कभी भी इच्छा नहीं की, न जिन्होंने दूसरे की स्त्री को कभी देखा, जिन्होंने अपने गृह संग के है जिसमें विद्वान् जीवित रहता है, पण्डित वे ही हैं जो पण्डितों से ईष्यां नहीं करते, मित्र वे ही हैं जो संकट प्रमाणस्वरूप ग्रहण किया है, जो रात्रिभोजन की विरति से सहित हैं। जिसने दिशा और विदिशा में जाने का में दूर नहीं होते। धन वही है जो दिन-दिन भोगा जाये, और जो फिर दीन-विकलजनों को दिया जाये। परिमाण किया है, www.jainelibrary.org in Education Intematon For Private & Personal use only
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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