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________________ • पेड विश्वाश्यगा पापळसुश्रवल आणपणालयालमणियछल माणुणवंडशा स्यामहापार्चितचिंतश्योरिय मतियामस्तश्भग्नश्कलकलि पुणदेवामावलि र शुणवणावमुणितंड अंगणकहकशंखंड देवणदश्याश्वहंपोयण परजाणमिदेसज्ञ रणलोयण ढोयश्याण्णकरियणढोयामधुणरउरयागशाला सताणुकुलकमुगुरुकाह रक्वधमुणनवनइमझायविवजिउसामरिसुशवसेंदाजशशाशआरणाल/ तापरिलसिल दिणमणाणिसिरामणी गयणकामिणीय अळंपरिनिवश्रुविराज्न जामिणीयालीमावरदि १६ वह सन्धि नहीं चाहता, युद्ध चाहता है। वह तुम्हें नहीं देखता, अपना भुजबल देखता है, आज्ञा का पालन घत्ता-वह परस्परा कुलक्रम गुरु द्वारा कथित क्षात्रधर्म नहीं समझता, मर्यादाविहीन सामर्ष वह शत्रु नहीं करता, अपने कौशल का पालन करता है; मान नहीं छोड़ता, भयरस छोड़ता है: दैव की चिन्ता नहीं अवश्य युद्ध करेगा'"॥२२॥ करता, वह अपने पौरुष की चिन्ता करता है; वह शान्ति नहीं चाहता, वह गृहकलह चाहता है। वह धरती नहीं देता, बाणावलि देता है। वह तुम्हें प्रणाम नहीं करता. मुनिसमूह को प्रणाम करता है। वह अंग नहीं निकालता, अपनी तलवार निकालता है: हे देव, भाई तुम्हें पोदनपुर नगर नहीं देता, परन्तु मैं जानता हूँ कि इतने में दिनमणि (सूर्य) खिसक गया, मानो गानरूपी कामिनी का चूडामणि हो, जैसे यामिनी ने शान्ति वह रण-भोजन देगा, वह रत्नों और गजरत्नों को उपहार में नहीं लेता वह मनुष्य वक्षों के रत्नों को लेगा। से शोभित उसे अस्ताचल के प्रति निवेदित किया हो। २३ Jain Education Internaan For Private & Personal use only www.jan331y.org
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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