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________________ ससममहियहिं पसंततिविसमानादिपहियदि रसविससारामहहियजहिखतिफलाश सुहियाप्फहिंगुफमालविहाहर चउदिसुरुणुरुगति दिहिराशिनासरुमल्लविकरण णियष्ट्रियतारवयवलुसियम विवाहखंचहरुवणसिरिह जहिंकणछेडसियलाश्रया रणालावरूकदरदारय सालिसारणकसणधवलापाचपापमणिमयाकाकाण समशिगजहिचरनिरिछावनिहाणाजचिदंदाविउ माणुसकळव्ययविदाविठजदि विहारूपासाउपियार पडणारियपदेकरगाउउववासविघडपणारजणठरोगडा कालकिनजाहिकपविकारणसणासुदाश्गुणीणगुणहिसरागमुदिहुसिहान्नविरिण सिटिक एउमाणिकमकहपरिकदे असिलाइववाहिलिया पठविसिहमारणसे कप्यावहश्सयाणधदुधजावणुणवाणिरुवाणिवतजा जनकसाइसणासंग याणासवारणरावावयगय थहनणणेवडथण्ठलए धरणाणवाडणजर्दियहरूख घना पस्करिणहिकालागिरिवहिजलखाश्यपायाराहजसाड़श्माक्षियतारणाडि मंडिउच्चा नहमिदार िधारणाले तहिसरगुरुसरूयनरायद्यापहणपन्डो रायालाइवारए। लियमहारएनायरहिंदिहाठिाकणनदंडकरतबउसाविउ तपिडिहारुतणवालाविन बुद्धि श्रम स सब आर स प्रवश करत हुए पाथका क द्वारा रस विशप का धारा स महकत हुए जहा सुराभत फल उत्पन्न रूप) हाता ह, वाशष्ट मारण सकल्प मनहा। जहा वन आर यावन सदव नवत्व धारण करत ह, खाये जाते हैं। पुष्पों के द्वारा मालाएँ गूंथी जाती हैं और भ्रमणशील मधुकर चारों दिशाओं में गुनगुना रहे हैं। निरुपद्रव रूप से रहते जन नवत्व धारण नहीं करते (पुरानी व्यवस्था का त्याग नहीं करते) । जहाँ अनासंग - घत्ता-जहाँ शब्द करके और चोंचरूपी कर से खींचकर रसीले लाल-लाल वनश्री के अधर के समान (संसार से विरक्त) मुनियों के लिए कुसादूषणु (पृथ्वी और लक्ष्मी दूषण) है, अश्वारोही और राज्यपद को कुंदरु फल को शुक ने काट खाया॥१२॥ प्राप्त व्यक्ति के लिए पृथ्वी और लक्ष्मी दूषण नहीं है। जहाँ स्तनों में सघनता और पतन है, वहाँ लोगों में सघनता और पतन नहीं है। जहाँ अधरों में धरण (पकड़ा जाना) और निष्पीड़न है, वहाँ के जनों में ये बातें धान्य के श्रेष्ठ खेतों के मार्ग में काले और सफेद बालवाले रीछ झनझनाते हुए घन कणों वाले धान्य को नहीं हैं। प्रतिदिन चुगते हैं। जहाँ निर्धनता (स्निग्धत्व) चन्द्रमा के द्वारा दिखायी जाती है, मनुष्य में निर्धनता दिखाई घत्ता-जो पुष्करिणियों, क्रीड़ागिरिवरों, जलखाइयों, प्राकारों तथा मोतियों के तोरणोंवाले चारों द्वारों नहीं देती। जहाँ विहार शब्द प्रासादों में प्रियकारक होता है, प्रेम उत्पन्न करनेवाला नारीजन के कण्ठ विहार से अलंकृत-शोभित है ॥१३॥ (हाररहित) नहीं है। जहाँ चटक (गौरैया) के द्वारा उपवास (गृहों के भीतर वास) किया जाता है, वहाँ के लोग रोग और दुष्काल के कारण उपवास नहीं करते। जहाँ किसी के द्वारा सुरागम नहीं किया जाता ऐसे उस पोदनपुर नगर में बृहस्पति के समान रूपवाला राजदूत प्रवेश करता हुआ राज्यालय के सुन्दर (मदिरापान), गुणियों के गुणों से सुरागम (देवागम) होता है। जहाँ मुनि दीक्षा में ही शिखा उच्छेद होता द्वार पर लोगों के द्वारा देखा गया। वहाँ स्वर्णदण्ड धारण करनेवाले सुन्दर विचारशील आश्चर्यचकित एवं है। माणिक्यों की किरण परीक्षा में शिखाच्छेद नहीं होता है। जहाँ लेपकर्म में असिलाभवरूप (अमूर्त से बुद्धिमान् प्रतिहार से वह बोलाFor Private & Personal use only www.jainelibrary.org १४ Jain Education Internations
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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