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________________ रविमासुपवासिदिदिपिजइसलिलुपचासिएदिायमा जलपरिहायायाटिंगोदरदारहिंज शवरसवणसदासादि पटमदेउलदिविहारहिंघरविवाहि वसावासबिलासहिरवाजमोहन जत्रिविहंडियाशंगयणयलिकउसयमडिया सिरणिदिलकणयकलराघरापावादी सितजिणेसरा अधियाणियकरदायपाविसे सोमाणिकखण्यरितापणसे दासश्सविचमक मनिवादि माविस्वाचिदम्पतिमादिज हिंअलिगसुअलयावलिमिलनिहारिमा सासाणलघुलनशाणवावासलदलहा जाइजलकालिरखालावयणठाउंति लियबहलमारंदांगु जहिंसररसंवादा पयतचेनखधश्मनामवियु सिरियाली दाङडसंमाना जदिंदा सस्तहियब उणयरुपवजन सासिरविनिविहसिमान वरिविलवियतरणिहे साधरणिहानावश्याकडुयासिटाणामहिमपहरुसाहहहमयावा इसंथाउजडवाहवग्नु अहिणेहदासरिलविदाइमाणुखिपळणकहिदोष कामिणिकमरा विलियर्ककमेण सिल्हाजनजाहिंजणुकोण कणिराणियाकिंकिणासासणाई गफ निवड जहाँ प्याउओं पर ठहरे हुए प्रवासियों के द्वारा कपूर से मिला हुआ पानी पिया जाता है। पराग प्रेम उत्पन्न हो गया है ऐसे कमल को सूर्य सम्बोधित करता है, (उसे खिलाता है) उसी को मतवाला घत्ता-जिनके परकोटे चन्द्रमा की प्रभा के समान हैं ऐसे, गोपुर द्वारवाले हजारों जिनमन्दिरों, मठों, हंस खुटक लेता है। श्रीधर (कमल और धनवान्) का दुष्ट साथ असुन्दर होता है। देवकुलों, विहारों, गृह विस्तारों, वेश्याओं के आवासों और विलासों में से॥१४॥ घत्ता-वह नगर जहाँ देखो वहीं भला तथा चन्द्रकान्त-सूर्यकान्त मणियों से भूषित नया दिखाई देता है। जिसके ऊपर सूर्य विलम्बित है ऐसी धरती के लिए मानो स्वर्ग ने उसे उपहार के रूप में भेजा हो॥१५॥ १५ जो उसी प्रकार शोभित हैं कि जिस प्रकार निरन्तर सैकड़ों ग्रहों से आकाश। जिनके अग्रभाग पर स्वर्णकलश रखे हुए हैं, ऐसे घर इस प्रकार मालूम होते हैं मानो उन्होंने जिनभगवान् का अभिषेक किया हो। जहाँ मनोहर हाट-मार्ग शोभित हैं, जो मानो बहुसंस्तृत (रलमणि आदि वस्तुओं/अनेक शस्त्रोंवाला) जिनमें हाथ के दर्पण विशेष ज्ञात नहीं होते, माणिक्यों से रचित ऐसी दीवारों में मदिरा से मत्त स्त्रियों को मूर्ख शिष्यवर्ग हो। जहाँ मान (तेल मापने का पात्र) स्नेह (तेल) से भरा हुआ शोभित है। जहाँ प्रस्थ (अन्न अपना बिम्ब दिखाई देता है, सौत समझकर वह उनके द्वारा पीटा जाता है, जहाँ भ्रमर-समूह अलकावली मापने का पात्र) के द्वारा द्रोण इस प्रकार भर दिया गया है जिस प्रकार बाणों से द्रोणाचार्य आच्छादित कर से घुल-मिल गया है, लेकिन चक्राकार घूमते हुए उसे श्वास के पवन ने निकाल दिया है। वह आँगन की दिये गये थे। स्त्रियों के पैरों से विगलित कुमकुम से युक्त मार्ग से जाता हुआ मनुष्य फिसल जाता है। रुनझुन बावड़ी के कमलों पर जाता है, और पानी में क्रीड़ा करती हुई बाला के शरीर पर बैठता है। वहाँ, जिसे प्रचुर करती हुई किंकिणियों के स्वरोंवाले गिरते हुए गहनों से वह गिर पड़ता है। www.jainelibrary.org sain Education international For Private & Personal use only
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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