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________________ दाहालसवलपरनिमल पद्धगिरिशिदरारोहणुकहावतदोरायदोसोसिहरिणि भाजलधारा सरिमदरिसिंहासान वमरीचामर छायाडमकन्नसदरमयणिनरवरगॉतराया देणयाराककोडमंगवद गदा रिसणधरम्नघणकोइलकलखणलवघचानरुततागारणाफलकवपवणादापत्र। महिमटिदरही चवचालश्पादेवमनराश्चारुडावधराधरवरासहरूवरुदचदका मरासिहरू परमपाययपधपश्पयसरमाणसमवसरण सहिपश्यरहिउपरमेसरुपिहिमसक तिसिपणवहरिण र्णकमळससासरहेंबङदपसगिरपघुनसुहसुलकणाए गिए श्राहंतवणसहसव सुहसवासाकुसमुत्रवज्ञ सरथचक्रवर्ति तिहासरितारुपराझार बझेकामपरणपराध्यउपासन आदिनाथकाच तिकरण लघुउवसामिा युद्धरिसिचवणसमसामिमउपपछवि अर्हिसवरू पहाटेणअर्दिसवरू पविलरकरतंकना इनग्नु मदेसतनारिवावदपलायनपश्सबाहिय केलासवासचम्लप्पिषु यचखया किलासवासमापिणारा उहवयक्षिणामिठकाणणय णिसणप्यिणुइहगिरिकाणणणे गपवन कैलास पर्वत के शिखर पर आरोहण (चढ़ाई) करता है। निर्झरों की जलधाराओं से जिसकी घाटी भरी हुई सुलक्षण वाणी में खूब स्तुति की - हे अरहन्त अनन्त, भव्यरूपी नक्षत्रों के चन्द्रजिन, तुम्हारी सेवा से सुख है, ऐसा वह पर्वत आते हुए राजा के लिए सिंहासन, चमरी, चामर, सुन्दर छायाद्रुमरूपी छत्र, मदनिर्भर गरजते होता है, तुम तृष्णारूपी नदी के तौर पर आ गये, परन्तु काम तुम्हारे पास नहीं पहुँचा। तुमने क्रोध की ज्वाला वर गज, गंडक (गैंडे)-गवय आदि वनचररूप किंकरों को उपहाररूप में आगे-आगे स्थापित करता है, मानो को शान्त कर दिया है। हे ऋषि, तुम भुवनत्रय के स्वामी हो, हे अहिंसाश्रेष्ठ देव, तुम्हें देखकर शबर दण्ड कोयल कलरव में आलाप करती है। से साँप को नहीं मारता। उसे नकुल भी कभी नहीं खाता और व्याघ्रों का समूह, महिषों का अन्त करनेवाला पत्ता-वृक्षवाले गिरि ने मानो फल-फूल और पत्ते उसे दे दिये मानो महीधर (राजा) महीधर (पर्वत) नहीं होता। की स्वीकृति का अवश्य पालन करता है ॥२२॥ घत्ता-हे कैलासवासी, आपके द्वारा सम्बोधित खेचर कैलास पर रहने का व्रत लेकर, कैलासवास २३ (मद्यभाजन और मद्य पीने की आशा) छोड़कर स्थित हैं ॥२३॥ अत्यन्त विशाल चन्द्रमा की किरण राशि का हरण करनेवाले पर्वत शिखर पर चढ़कर परमात्मा का पुत्र २४ प्रवेश करता है और जहाँ समवसरण है वहाँ पहुँचता है। कामदेव का नाश करनेवाले परमात्मा को उसने हे ब्रह्मन्, तुमसे निकले हुए वचन सुनकर इस गिरि कानन में इस प्रकार देखा जैसे प्यासे हरिण ने कमलसरोवर को देखा हो। तब भरत ने तरह-तरह के छन्दों के प्रस्तारवाली Jain Education International For Private & Personal use only www.jainelibrary.org
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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