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________________ घंटियहि मालअलिमालालंटियहि सातादिमीणखश्मसंघियवसायव पत्रालय विश्पसुखणह राजमजियनबउसस्थाई छत्रसयवासिरिलदह वणवश लणमितहाधना यगहिविपित्रणामणदरमरालवालाग विपहविया पियस्वा महागयगगाणशारापडविजयलहित्रालिंगियठसकेपणादसामारियल सुर सरिसाहयिषणासरशवलदिपाणुकयाणासरझसरितारपाजपपुरवाराहरिण विडकितहिंचरजाधिलिहॉलिगयतस्वरविरावलियठहरहिमरविसरिजनश ननवार्यकयहि बलुनर्विधतासयहिं सरिबजश्सहिंझलयहिं बलुचजश्व वलहिचामरहि सरिछसवांतत्रसहि वलुजस्कखालहिंअसहि सरिजजाश्च काहसालाहवलुछाशाहपकाहगयाहासरितासरतरंगतरविललाइचला उगवर्हि सरिजनश्कालियजलकरिहि बलुतजश्चखियमयकरिसिॉरहनवड जलमाणुसहि बलुहमकिंकरमाणसहि सरितजसयरहिंसाहिदि वललाश साडहिंवादियादिधिना जिहाजलवाहिणिय तिहाणिववखाहिणिसाहमाहिहरस भ्रमरमाला से निनादित सुमनमाला, चारों समुद्रपतियों का अतिक्रमण करनेवाले राजा को शोभा देती है। चर सकता है, कि जहाँ वृक्ष और पेड़ धूल हो जाते हैं, उछलती हुई धूल से सूर्य ढक गया है। उगे हुए कमलों देवरत्नों की मालाएँ दी गयीं। देवजनों के हृदय प्रसन्न हो गये। कमल हो उस लक्ष्मीलता गंगा के छत्र, वेष से नदी शोभा पाती है और सेना रंग-बिरंगे सैकड़ों छत्रों से । नदी, हंसों और जलचरों से शोभा पाती है, और और वस्त्र थे। सेना धवल चमरों से। नदी शोभित हैं, तैरती हुई मछलियों से, और सेना शोभित है तलवारों तथा झस अस्त्रों ___घत्ता-इस प्रकार उन्हें ग्रहण कर राजा ने सुन्दर हंस के समान चालबाली गंगानदी की पूजा कर उसे । से। नदी शोभित है संगत जलावों से, सेना शोभित है रथचक्रों और गजों से। नदी शोभित है स्वरों और भेज दिया, वह अपने घर चली गयी ॥११॥ तरंगों के भार से, सेना शोभित है श्रेष्ठ जल तुरंगों से। नदी शोभित है क्रीड़ा करते हुए जलगजों से, सेना शोभित है चलते हुए मैगल गजों से । नदी शोभित है बहु जलमानुसों से, सेना शोभित है किंनर मानुसों से। नदी अपने तटों से शोभित है, सेना शोभित है चलाये हुए शकटों से। विजयरूपी लक्ष्मी से आलिंगित उस स्वामी का दर्शन बताओ किस किसने नहीं माँगा। गंगानदी को पत्ता-जिस प्रकार जलवाहिनी (नदी) शोभित है, उसी प्रकार महीपतिवाहिनी (राजा की सेना) शोभित प्रसन्न कर दरिद्रों से प्रेम करनेवाला और दान देनेवाला सैन्य वहाँ से कूच करता है। हरिणसमूह वहाँ क्या है। १२ Jain Education International For Private & Personal use only www.jainelibrary.org
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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