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The thunder roars and the rain pours, a yellow and dark rainbow adorns the sky. The earth is bright, peacocks dance with their iridescent feathers spread across the green grass. The rainy season has arrived, it seems to be growing like a banner. The hearts of the wives are burning with love for their husbands, their eyes fixed on the crimson women adorned with blooming Kadamba flowers. The water falls on the blade of the sword and flows again, revealing the warriors. The wet earth fills the hearts of the people with sorrow. Lightning flashes, the lion roars and approaches the raised arms, but it does not stay there and wants to leave. Who is consumed by greed? The trees crack and break, the mountains crumble. The water flows, spreads, and swirls in the valley. What drives its speed? It is carried by the wings of the bees and rushes over the faces of the brides, carrying the written messages. The river overflows, water and land are all submerged. It washes away everything, leaving no trace of the path. Who can bear the adornment of the enemy's wife? It falls on the heads of the elephants, washing away their vermilion. Kamadeva carefully aims his arrow and pierces the heart of the love-stricken traveler. "Oh, banner, I have made you great, now you are adorned with the banners of others, my voice (head)..." The water flows downwards, the lightning burns, the bow of Indra is without qualities and crooked. The rain is now like a deadly arrow (head). It seems that the cloud is like a wicked person, raining down on the king. The thunder roars and says, "It washes away the intoxicating water of the elephants, it seems that the wicked clouds do not like charity." The chariots, along with the chakravakas, have stopped, as if they were lakes. Who does not swim in the water? The trees are struck by the rushing currents of water, and the animals have fled. The sound of the new clouds...
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________________ सश्वरिसधा पायलुसामलविलससरधषुमहिणीहरिहटिवश्त्या पवसियपियापिटा लिप्यन्तापक्वलकारंतवदासवाण तिमाईसम्मश्मोजरजण तडितडयदृश्यडामहारा तरुकडयफडशवडगिरिजलपरियलचलधाभश्हारअश्यसरइसरस्यूरसारजल थलसदलजसजादागामायमरविकिषिपणाटक सरकसमसहाणराहिसघशावदमाथ यर्विधान पापिलंगायग विज्ञविडेवाणिखएकदिल्लसरिदहापाउसह्यमणहो समुजाहा जीवरिसड्जवरिपरिदहोविज्ञासलिललल्लरलयडिपेलणहरड़मविषय रिलमा पवधणरावमुश्यचंदककलामहसियपिंचनालादासश्लग्नठवासानन सणामहिल हणावशवम असिजलेणिवडेविमलपुणधावसडनदहोसम्मुशावतातिणमिल रंगमञ्जमगाइलाईगिलियहोकाकिरलगाववकिपिलिपिछहिंदलियाकमहलिहि यठपन्नावलियम कामंडपुविसदलिघरिणाहाटालशशिरसिंहाईकरिणिहिवसर्वसनम वहारिस एवहिपरचिंधदेयारिटमकसम्पाणहारिणावसरून्यगईनवपलणाईजलहाधार यमयमायगहंदाणडाहहरु तिपदाण यक्वसबकवायरहणसरतापतरतिणकका १३१ घन-कुल गरजता है और बरसता है, पीला और श्यामल इन्द्रधनुष शोभित है। मही निखर उठी है, हरी घास से अपने चन्द्रकलाप फैलाकर मयूर नाच रहे हैं, ऐसी वर्षा ऋतु आ गयी दिखाई देती है, जैसे वह सेनारूपी बढ़ रही है, प्रोषित-पतिकाओं का मन पिय के लिए सन्तप्त हो रहा है, बान खिले हुए कदम्ब वृक्षों से आरक्त महिला पर आसक्त हो। तलवार के जल (की धार) पर गिरकर पानी फिर दौड़ता है, और योद्धाओं के दिखाई देते हैं, गीला-गीला होकर जन-मन में खेद को प्राप्त होता है, बिजली तड़-तड़ पड़ती है, सिंह गरजता भुजदण्डों के सम्मुख आता है, वह वहाँ भी नहीं ठहरता और वहाँ से जाना चाहता है, लोभ से ग्रस्त कौन है, वृक्ष कड़-कड़ करके टूटते हैं, पहाड़ विघटित होता है। जल बहता है, फैलता है, घाटी में घूमता है। वेग किससे लगता है, वह भ्रमरों के पंखों से दलित होकर वधुओं के मुखों पर लिखित पत्रावली को कुछ-कुछ से दौड़ता है, नदी पूर से भरती है, जल और थल सब कुछ जलमय हो गया। मार्ग-अमार्ग कुछ भी नहीं मालूम धोता है। शत्रु की गृहिणी के मण्डन को कौन सहन करता है, वह हथिनियों के सिरों का सिन्दूर ढोर देता पड़ता। कामदेव अपने तीर का अच्छी तरह सन्धान करता है और विरह से पीड़ित पथिक को विद्ध करता है। है।"हे ध्वजदण्ड, तुम्हें मैंने बड़ा किया है इस समय दूसरों के ध्वजचिह्नों से शोभित हो, मेरा सर (स्वर) घत्ता-पानी निम्नगति है, बिजली भी जलाती है, देवेन्द्र का धनुष निर्गुण और कुटिल है। पावस हतमन अब प्राणहारी (प्राण धारण करनेवाला/प्राण हरण करनेवाला) सर (सर/तीर) के समान है।" मानो मेघ दुर्जन के समान है कि जो राजा के ऊपर बरस रहा है॥९॥ गरजते हुए इस प्रकार कह रहा है। वह मैगल गजों के मदजल को धोता है, मानो दुष्ट मेघों के लिए दान १० अच्छा नहीं लगता। चक्रवाक सहित रथ ठहर गये हैं मानो सरोवर हों, पानी में कौन-कौन मनुष्य नहीं तिरते। जिसमें जल की धाराओं की रेलपेल से वृक्ष आहत हैं और पशु चले गये हैं, जिसमें नवमेघों की ध्वनि 273 www.jainelibrary.org in Education Internet For Private & Personal use only
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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