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________________ याउलिमवहलसायलसारखारमहावहिवारक्षाघतायतदेमदिणादिसुयमजणेरिद ससिमणिरश्यपकाल सायरगिरिरायहिधरिदिसरादरहिपाणिवहाभहला सरिपविमहिपरमेसरमामुनिसारहिसरदसरणाचासणयणाविनमणागिहिरणवकुसमावा मासिमलभरविद्धरमजतङलिसकरपालसेवालणालयानचलाल तडावडावगलियमहरिण पिंगाचलजललंगावलिवलितंग सियधोलमाएडिडास्वारपवाडुअतारसुसारदार विहिरणमणा वरपूलिणरमण णणाविलासिणिमंदगमण कमयाहसणसुसियकामलंगिण विहंग हाविदगि तंथिसुणविरहिवरात्र कमणीनकामियाकामवा धरणीसमउडमणिकिरणरा शरुरंजियवरणापरसराश्वालिद्दपकसासादिणसधुप्रवलकयाधियतिशयम पणश्य। पपयाणियपरमपणय णिसणसणदिणाहयतपय सधरधरिदयणसमल मतिहेकराम महला गंसारपसासुलरकणालामुकदेवरीकछमालारहवरसिरिवहरिसियरहंग किंण क्यिाणहिंणामणगंगा हिमवंतपोमसरणियारति णमहिवामहेपरिहाणसंगिता गिरिगह धरणियलाई जलणिहिधिवलहिं बहश्शायससिदिति रावणत्रयगामिणि जणमयरमिणिाय जिसमें प्रचुर शीतल हिमकण उछल रहे हैं, ऐसी वह मानो क्षीरसमुद्र की क्षीरधारा के समान जान पड़ती यह श्वेत कोमलांगी कौन है? बताओ। यह विहंगो (पक्षिणी) की तरह विहंगों से प्रेम करती है।" यह सुनकर सारथि बोला- "हे सुन्दर कामिनियों के लिए कामदेव के समान, राजाओं के मुकुटमणियों की किरणों से घत्ता-सरागी समुद्र और हिमालय दोनों ने मानो मिलकर चन्द्रकान्त मणियों की प्रभा से उज्ज्वल इसे शोभित, कान्ति से रंजित प्रथम चक्रवर्ती राजन्, दारिद्रयरूपी कीचड़ के शोषण के लिए दिनेश्वर, अपने (गंगा को) पकड़कर विश्व को जन्म देनेवाली इस धरतीरूपी नारी से मेखला के रूप में बाँध दिया है॥७॥ भुजबल से त्रिभुवन ईश को कैंपानेवाले, प्रणयिनी स्त्रियों से परम प्रणय करनेवाले हे नाभेयतनय राजन्, सुनिए-क्या आप नहीं जानते कि यह गंगा नाम की नदी है, मन्त्री की महार्थवाली मति की तरह जो पृथ्वी नदी को देखकर धरती के परमेश्वर भरतेश्वर ने सारथि से पूछा-"मत्स्यों के नेत्रवाली, जलावर्तो की के धरणीन्द्रों (राजाओं-पर्वतों) का भेदन करने में समर्थ है; गम्भीर, प्रसन्न और सुलक्षणों वाली जो मानो नाभि से गम्भीर, नवकुसुमों से मिले हुए भ्रमरों के केशोंवाली, डूबते हुए गजों के कुम्भों के स्तनोंवाली, शैवाल सुकवि की काव्यलीला के समान है। और स्थश्री की तरह रथांग (चक्रवाक और चक्र) को दिखानेवाली के नीले नेत्रांचलों से अंचित, किनारों के वृक्षों से विगलित मधुकेशर से पीली, चंचल जलों की भुंगावली है। हिमवन्त सरोवर से निकलनेवाली जो मानो धरतीरूपी वधू के चलने की भंगिमा है। से मुड़ी हुई तरंगोंवाली, सफेद और फैले हुए फेन के वस्त्रोंवाली, हवा से हिलते हुए स्वच्छ हिमकणों के घत्ता-यह पर्वत, आकाश, धरणीतलों और समुद्र के विवरों की शोभा धारण करती है। तीनों लोकों हारवाली, विस्तृत सुन्दर पुलिनों से सुन्दर, यह नदी मन्द चलनेवाली विलासिनी के समान जान पड़ती है, में परिभ्रमण करनेवाली जनमनों के लिए सुन्दर यह चन्द्रमा की दीप्तिवाली तम्हारी कीर्ति के समान है॥८॥ www.jainelibrary.org For Private & Personal use only Jain Education International
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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