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________________ णिडुअदिसविदिसासंशगयखाई पंचारित्रसमणक्याईससिकंलगलियजोपाजलेण पखा लियापाणिम्मलण णिहदश्वमखसराससंकुतहोतणजिल्लाउविवेयक सोयज्ञविदासज्ञ मलावरुदुणिमडिलपराहकोणकद्द तेणजिरासरवितिवनवासरत्याहाकवि खिल्लखर वश्यकतासुकरणलिणालानग्गनवंधवडकॉल कुवलयदिदिगारणारंण्डाक यवधुजावसहाटामाटातरुक्कसमामोएमहमहत्ति यकबिलइसलिलवणवहतियालिस यस्पतियावाइपिंडमडमनाएंगादेलिसांड घनासारखमयलवपुरुजिमजाजश मयमलिणाहीतर तोहंकयसंतिहाजिण्डासकितिहण्डनेटाउतलाशमणवपिण लणिसिद्धसम अवठलविसंसविसबलदेसावाणिपश्सपिअझ परचकमुक्कपल रणगशमपढायविनायवितापवयण परिचविश्वविचक्करखपदालिद्दलहपवासि साईकाणाणहंदीपदसियाकं णिहपविधरण्चामायण पाणाविलासतोसायरण में तिक्विदंगपंचगुमत कासन्तुमिचुकातचित पारमाणविमापविडहवालदारविमरे रजसा अश्याग्गठमाणकोणकपुसणुकणणकेणनिमुक्कुदप्यु सुपर्दडवंडविकममाण दशों दिशाएँ रज से इस प्रकार अत्यन्त शून्य हो गयीं (निर्मल हो गयीं) मानो सज्जनों के निर्मल चरित्र हों। घत्ता-अपनी कान्ति से जनों को रंजित करनेवाला शरद् का चन्द्रमा, यदि मृग के लांछन से मैला नहीं होता, मानो वे चन्द्ररूपी घड़े से प्रगलित ज्योत्स्नारूपी निर्मल जल से प्रक्षालित कर दी गयी हों। शरद् में तो मैं (कवि पुष्पदंत) उसकी शान्ति का विधान करनेवाले जिन भगवान् के यशरूपी चन्द्रमा से उपमा देता ॥१॥ शशांक-चन्द्रमा कमल को जलाता है, इसीलिए उसका (कमल का) शरीर-पंक उसो को (चन्द्रमा को) लग गया। वह (सूर्य) आज भी मल-विरुद्ध दिखायी देता है, अपने बच्चे के पराभव से कौन क्रुद्ध नहीं होता? सिद्धों को प्रणाम कर और शेष तिल (निर्माल्य) लेकर समस्त देशों पर बलपूर्वक आक्रमण कर, उन्हें क्या इसी क्रोध से सूर्य तीव्र तपता है, और कमलबन्धु (सूर्य) कीचड़ को सुखाता है, कीचड़ के सूखने से स्थापित कर और शत्रुमण्डल के द्वारा छोड़े गये अस्त्रों के लिए दुर्गाह्य अयोध्या में प्रवेश कर, मन को लगाकर, कमलों के नाल (मृणाल) सूख जाते हैं, अत्यन्त उग्रता बन्धुओं के लिए भी काल सिद्ध होती है। जिसने पुत्र का मुख देखकर और चक्ररत्न की परिक्रमा और अर्चना कर प्रवासियों, परदेशियों और कन्यापुत्रों का अपने बन्धुओं के प्राणों के लिए सुन्दर छाया का भाव किया है, ऐसा चन्द्रमा राजा की तरह कुवलय (कुमुदों । भयंकर दारिद्रय, स्वर्णदान के द्वारा समाप्त कर, अभंग पंचांग मन्त्र की मन्त्रणा कर कोन शत्रु है, कौन मित्र और पृथ्वीरूपी मण्डल) के लिए भाग्यकारक होता है । कुसुमों के आमोद से वृक्ष महक रहे हैं। पराग से है, और कौन विरक्त (मध्यस्थ) है? यह जानकर वृद्ध मन्त्रियों के आचार को मानकर और विचारकर राज्यपीले जल वन में बह रहे हैं। पाप के समान रंगवाले अर्थात् काले रंग के भ्रमर गुनगुना रहे हैं, मानो मधु भार देकर (वह चला) बताओ, उसने अतिगर्वित किससे कर नहीं माँगा, किस-किसने गर्व नहीं छोड़ा? से मत्त मद्यप गा रहे हों। भुजदण्डों के प्रचण्ड विक्रम और मदवाले उसके द्वारा For Private & Personal use only www.jan217,og in Education Intematon
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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