SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 137
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ अजरामर तेलहंतिसुखंवराबाजेणमारकफलतंयाविनाशसोद्यामधिलण्ठगिनशखमखमाइला अंगायदेह महवपूलग्गजवसाइ सबसवमूलुजमदलु विदमहातवणवणवकुसुमाग्ल चविडवायपसारियपरिमलापापियसवलायपायउलादयसदाहसद्दकयकलरलसुरणख सवारसदसयफलदाणाणाहदाइसमाणात सहसामुतामितपरिपतवसरलाटापसास। उसनहसणियाहिंसामासिन पहाअमरकुलदिपजीवदयावयराखशागताणुलल्ला किशमिळामयज्ञपवसुनदिाश्सालसलिलारपरिचिजाइएमपयपारिजशाया। कावाणलवकर होश्यरुक्करजारिसिदिहिसिहाई जगेताश्मुहकरूधम्ममहातरु देशफलाए सुमिहशाशखिंड अहिदोहमिलबेलवे तदिदेहम्मिनवेनवेदकलरकाणिमासणा हाउसनिक्षिण सासणाला अवरुणितसमझियग श्यमगवनमणुपमा चिनुवनसिहतपरमादसवेरवेदार उजिणामसम्म पचिंदियपडिलडवलहाउसवेरदेविमलहिण्जन विसयकसायरायप रिचनठासवेसवेहाउतियतिपयतमासापासणिवंधण ठसविलदिमाजालहन संजय साडसंगसोहिममले सवेसवेजमुहाउसावमलाइमूहहोसवाणगाण सवेसवेरिसिगरुहोसडा १८ अजर-अमर श्रेष्ठ सुख प्राप्त करते हैं। जिससे मोक्षरूपी फल प्राप्त किया जाता है वह धर्मरूपी वृक्ष इस प्रकार घत्ता-क्रोधरूषी ज्वाला से बचने पर यह धर्मरूपी वृक्ष शीघ्र बड़ा हो जाता है, जिनकी रचना ऋषीन्द्रों वर्णित किया जाता है। उसका शरीर क्षमारूपी पृथ्वीतल से उत्पन्न है। मार्दव उसके पत्ते हैं, आर्जब उसकी ने की है, जग में उन अत्यन्त मीठे फलों को यह शुभंकर धर्मरूपी महावृक्ष देता है ॥१७॥ शाखाएँ हैं, सत्य और शौच उसकी जड़ है, संयम उसका दल है, वह दो प्रकार के महातप रूपी नवकुसुमों से व्याप्त है, जिसका चार प्रकार के त्याग का परिमल प्रसारित हो रहा है और जो भव्य लोकरूपी भ्रमरकुल को प्रसन्न करता है, जिसमें मुनि समूह के शब्दों की कलकल ध्वनि हो रही है, जो सुरवर, विद्याधर और मनुष्यों मैं जन्म-जन्म में जहाँ होऊँ, वहाँ नये-नये शरीर में लाखों दु:खों का नाश करनेवाले जिनशासन को को शतशुभ फल देनेवाला है, दीन और अनाथों के दीर्घ श्रम का निग्रह करनेवाला है, जो शुद्ध, सौम्य और भक्ति हो। धूतों के सिद्धान्तों से पराङ्मुख चित्त जन्म-जन्म में जिनागम के सम्मुख हो। पंचेन्द्रिय प्रतिशत्रुओं शरीर मात्र का परिग्रह रखनेवाला है, जो ब्रह्मचर्य की छाया (कान्ति) से शोभित है, राजहंसों के समूह से समादृत का बल नष्ट हो, जन्म-जन्म में विमल बुद्धि उत्पन्न हो, विषयकषाय और राग भाव से परित्यक्त तीन गुप्तियाँ है। इस धर्मरूपी वृक्ष को देखना चाहिए और जीवदयारूपी वृत्ति (बागड़) के द्वारा रक्षा करनी चाहिए। उसे जन्म-जन्म में हों। जन्म-जन्म में आशापाश का बन्धन टूटे और मोहजाल कम हो। संयमी साधुओं के संग ध्यानरूपी स्थाणु का सहारा देना चाहिए, मिथ्यात्वरूपी पशुओं को उसके पास प्रवेश नहीं देना चाहिए, शोलरूपी से शोधित श्रावक कुल में मेरा जन्म, जन्म-जन्म में हो। अनुरक्त मूों को सम्बोधित करनेवाले आदरणीय जल की धारा से उसका सिंचन करना चाहिए। इस प्रकार प्रयत्नपूर्वक उसे बढ़ाना चाहिए। ऋषि जन्म-जन्म में मेरे गुरु हों। For Private & Personal use only www.jainelibrary.org Jain Education Internatons
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy