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________________ रकमूलअनावणकरणहिर हंदूसहदुकसाबसयलरियहि होयकामेणिजारतिरियाविरजाइयेण्यापाणदोहं कामणि, जारासरिसताण सिसिण्यासणिवासादरणहिथियबलियंचधिनमहिंदडहिंगोडहवामागाह गदसाडाहा पाकमासवरिसहववासहिं बेजविनिसंखाविमासहि रत्ना टोलणासासहम। तणुमूसाखरतवजलणेतना जाविग्हमुहाल थक्वश्वलाकमामलेपरिचन्तनापनड वा पहेजतरूलए णाणकसेपणिसंग चयपायवणिचरण साहणियमाचारण माइक गासदागासाहारदि विविज्ञावगादासपरिहारहिंदीमयुलामहिंमल्लधरणार्दिबायविलचा दादाण चाहि वोसगमकररंगहि वजियघरपुरदेशपसंगदि सुमावासमसाणागारहि हया गदर्दिअणिमाविहारदि दसमसयाहत्म्हासोसहि खलक्यकपकाकासहिवायवद्द लुकेपियकायाहिं सीहियरपदरणिहायहि कसालचणनिचलनदिकवणतिणामुहिरिहर समूचित्रहिविसमपीसहसहवासहिीं गयातकहिंकासहिंसामादि जम्माणमरणनिर्वधयाना एम खविज्ञाश्कामराठी साजिहहयणिझरणे वईवरणारविकरहिंसमसामतिहणियुमियका रारासतवचरणासकिनकमुपणासशारखंडयायिकामाणिकराजलपतिलवारणाराया असह्य दुःख भाव से भरे हुए तियंचों की अनाम निर्जरा होती है। शिशिर में आकाश के नीचे निवास करनेवाले, कायोत्सर्ग से रतिरंग को छोड़नेवाले, घर, पुर और देश के प्रसंगों से दूर रहनेवाले, शून्य आवास और मरघटों वृक्षों के मूल में आतापन तपनेवाले, पर्यंकासनों में स्थित और महीदण्ड पर अपने को निक्षिप्त करनेवाले गोदुह को आवास बनानेवाले, स्नेह से रहित और अनियमित विहार करनेवाले, दंश-मशक, भूख और प्यास को और गजशौंड आसनोंवाले, पक्ष-माह और वर्ष के अन्त तक उपवास करनेवाले, देव और आहार की वृत्ति सहन करनेवाले, दुष्टों के द्वारा किये गये कर्णकटुक आक्रोशवाले, वायु और बादलों से उत्कम्पित शरीर से और संख्या की रचना करनेवाले, वैराग्य प्रधान ऋषि सन्तानों के द्वारा युक्त मुनियों के द्वारा शीतोष्ण पर-प्रहार के समूहों, केशलोंच और अचेलकत्वों (दिगम्बरत्व), स्वर्ण और पत्ता-श्वास से चलते हुए मुनि के शरीररूपी धातुविशेष (मूषा) में तीव्र तपच्चाला से तपकर जीवन तृण, मित्र और शत्रु में समचित्तों, विषम परीषहों के सहन करने के अभ्यासों, रोगों से आक्रान्त खाँसी और स्वर्ण की तरह उज्ज्वल और कर्ममल से मुक्त होकर केवली होकर रह जाता है ॥१५॥ श्वासों के द्वारा, जन्म और मृत्यु के प्रबन्ध में प्रवृत्त पुराने कर्मों का इस प्रकार क्षय किया जाता है। घत्ता-जिस प्रकार झरना सूखने और पाल बँध जाने पर रवि की किरणों से सरोवर सूख जाता है, उसी प्रकार इन्द्रियों को नियमित करने और ऋषि के तप का आचरण करने से संसार में किया गया कर्म नष्ट हो व्रतरूपी वृक्ष को विदारित करनेवाले अपने मनरूपी हाथी को साधु कुमार्ग में जाने से रोकता है और जाता है ।। १६ ।। ज्ञानरूपी अंकुश से उसे वश में रखता है। एक या दो कौर आहार करनेवाला विविध अवग्रहों और रसों का परिहार करनेवाले लम्बी दाढ़ी और बालवाले मलधारी, आताम्र और चान्द्रायण तप का आचरण करनेवाले, इस प्रकार निर्जरा कर भवरूपी कारागृह को नष्ट कर देते हैं, वे नीरोग १७ Jain Education International For Private & Personal use only
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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