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________________ कमकमलालपरमेसरपशमिमहारिवारिणलाकणधिवविणासिसहारझोणउपरिरकि यखामारहो जिम्मध्यवरामलमालणशंकालिविहडियाश्याहरणश्तणुलामखुवाए, परिलसियठाजंटमासंरुहिरुविसुसियजयाणखेलकोविण अमहायवहिंसर पर हामह असणवसणसणसंपविलवणजाणासयणासण्ज्ञतिहाणिदिलकलाविससस पचिहिकरिनिश्चितयससहविहिणिसणेविजायकारूदेवपउरणाणसंयपाकरिसणय करणधरणममालिवहह हरिकरिमसमहिसविसकरहहायघडलाय्णुसायरंजण घरपरि यूएविपादमजणु सेजसरीरताणुजलवारण हारुदारकमेरुसका असिमसिसिम्मिए विनिहाय अखिउलोयहाततिहतहलाता परमसरु सुथरिया आइसरिसकमला। सजययासविसतासिविा पालशवलियसासपुश्णिरायताण अवरविरणियवणियवाहलह रसुमयिकहियकलवहा जडपरिवडिलधाचंडालविपयडियविविदवसुवहाठिालेहडा लोहयारुर्घसारुवि तिलपीलउमालिउचमारूविजेहिंजंजिणिमकामुपयासिनताहंतनिकुलदखें पत्ता-धरती को अच्छी तरह धारण करनेवाले आदिपुरुष ब्रह्म वह परमेश्वर विश्व को (जनों को) सन्तुष्ट कर और भेजकर क्षत्रिय शासन का पालन करने लगते हैं ॥१९॥ चरणकमलयुगल जिनके, ऐसे हे परमेश्वर, महान शत्रुओं का निवारण करनेवाले आपने भी, कल्पवृक्षों के नष्ट होने पर, प्रलय और भूखरूपी मारी से हमारी रक्षा नहीं की। वस्त्र मल से मैले और जीर्ण हो चुके हैं, समय के साथ आभरण नष्ट हो चुके हैं, शरीर का लावण्य और वर्ण चला गया है, पेट की आग से खून भी सूख गया है। इस समय हमारा आधारस्तम्भ कौन है? हम आपकी शरण में आये हैं। अशन, वसन, भूषण और सम्पत्तियोंवाली समस्त वृत्तियों से हमें निश्चिन्त करिए। यह सुनकर उत्पन्न हुई है करुणा जिन्हें ऐसे प्रचुर ज्ञान से सम्पूर्ण देव ने खेती करना, बोड़ा-हाथी-मेष-महिष-वृषभ और अरण्य आदि पशुओं की रक्षा करना, पट, घट, भोजन, भाजन, रंजन और घर बनाने की विधि, सुन्दर पीठशय्या, कवच, हार, दोर, कंचनसहित केयूर, असि-मषि आदि कर्म जो जिस प्रकार थे, उसकी वैसी व्याख्या की। २० और भी अच्छे चरितवाले तथा कुलपथ का कथन करनेवाले वणिक् और किसान कहे जाते हैं। धर्म से पतित तथा तरह-तरह के पशुवध को प्रकट करनेवाले जड़ चाण्डाल भी। लेखक, लुहार, कुम्हार, तेली और चमार भी। जिन लोगों ने अपना जो कर्म प्रकाशित किया है, कुलदेव ऋषभ ने उन्हें वही घोषित कर दिया। Jain Education Internation For Private & Personal use only www.jainelibrary.org
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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