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________________ महापुराणे उत्तरपुराणम् पद्मनाभः सुतो जातस्तयोः सुस्वम पूर्वकम् । बालानुकूलपर्युष्टिविशेषैः सोऽभ्यवर्द्धत ॥१३॥ उपयोगक्षमाशेषपर्याप्तिपरिनिष्टितम् । आरोप्य तं प्रतं राजा विद्यागृहमवीविशत् ॥ १३२॥ अभिजातपरीवारो दासहस्तिपकादिकान् । दूरीकृत्य स निःशेषा विद्याः शिक्षितुमुद्ययौ ॥ १३३॥ तथेन्द्रियततिस्तेन पराजीयत सा यथा । निजाथैः सर्वभावेन तनोति प्रीतिमात्मनः॥१३॥ स धीमान् वृद्धसंयोगं व्यधाद् विनयवृद्धये। विनयः शासनिर्णीतः कृत्रिमः सहजोऽपरः ॥ १३५॥ तं सम्पूर्णकलं प्राप्य कान्तं सहजकृत्रिमौ । राजानं गुरुशुक्रौ वा रेजतुविनयौ भृशम् ॥ १३६ ॥ स धीमान् षोडशे वर्षे विरेजे प्राप्य यौवनम् । वनं सुष्टु विनीतात्मा संयतो वा जितेन्द्रियः ॥ १३७॥ रूपान्वयवय:शिक्षासम्पन्नं तमविक्रियम् । भद्रं गजं विनीतात्मा४ समालोक्य मुदा पिता ॥१३८॥ विद्यापूजां विधायास्य जिनपूजापुरःसरम् । संस्कृतस्येव रत्नस्य व्यधाद् बुद्धि क्रियान्तरे ॥ १३९ ॥ कलाभिरिव बालेन्दु शुद्धपक्षसमाश्रयात् । रम्यं राजा तमूर्जी वा प्रमदाभिरपूरयन् ॥१४॥ तस्य सोमप्रभादीनां देवीनामभवन् सुताः। शुभाः सुवर्णनाभाद्याः भास्करस्येव भानवः ॥११॥ पुत्रपौत्रादिभिः श्रीमान् परीतः कनकप्रभः । स्वराज्यं पालयमेवं सुखेनान्येचुरुधीः ॥ १४२ ॥ मनोहरवने धर्म श्रीधराजिनपुङ्गवात् । श्रुत्वा संयोज्य साम्राज्यं सूनी संयम्य निर्वृतः ॥ १३ ॥ पद्मनाभश्च तत्रैव गृहीतोपासकम्रतः । तन्त्रावापगतव्याप्तिममात्यैः सम्प्रवर्तयन् ॥ १४४ ॥ उत्पन्न हुआ। पद्मनाभ, बालकोचित सेवा-विशेषके द्वारा निरन्तर वृद्धिको प्राप्त होता रहता था ॥ १३०-१३१ ॥ उपयोग तथा क्षमा आदि सब गुणोंकी पूर्णता हो जानेपर राजाने उसे व्रत देकर विद्यागृहमें प्रविष्ट कराया ।। १३२ ॥ कुलीन विद्वानोंके साथ रहनेवाला वह राजकुमार, दास तथा महावत आदिको दूर कर समस्त विद्याओंके सीखनेमें उद्यम करने लगा ।। १३३ ॥ उसने इन्द्रियोंके समूहको इस प्रकार जीत रक्खा था कि वे इन्द्रियाँ सब रूपसे अपने विषयोंके द्वारा केवल आत्माके साथ ही प्रेम बढाती थीं ॥ १३४॥ वह बुद्धिमान् विनयकी वृद्धिके लिए सदा वृद्धजनोंकी संगति करता था। शास्त्रोंसे निर्णय कर विनय करना कृत्रिम विनय है और स्वभावसे ही विनय करना स्वाभाविक विनय है ।। १३५ ।। जिस प्रकार चन्द्रमाको पाकर गुरु और शुक्र ग्रह अत्यन्त सुशोभित होते हैं उसी प्रकार सम्पूर्ण कलाओंको धारण करनेवाले अतिशय सुन्दर उस राजकुमारको पाकर स्वाभाविक और कृत्रिम-दोनों प्रकारके विमान अतिशय सुशोभित हो रहे थे। १३६ ॥ मान राजकुमार सोलहवें वर्षमें यौवन प्राप्त कर ऐसा सुशोभित हुआ जैसा कि विनयवान् जितेन्द्रिय संयमी वनको पाकर सुशोभित होता है ।। १३७ ।। जिस प्रकार भद्र जातिके हाथीको देखकर उसका शिक्षक हर्षित होता है उसी प्रकार रूप, वंश, अवस्था और शिक्षासे सम्पन्न तथा विकारसे रहित पुत्रको देखकर पिता बहुत ही हर्षित हुए। उन्होंने जिनेन्द्र भगवान्की पूजाके साथ उसकी विद्याकी पूजा की तथा संस्कार किये हुए रत्नके समान उसकी बुद्धि दूसरे कार्यमें लगाई ॥१६ जिस प्रकार शुद्धपक्ष-शुक्लपक्षके आश्रयसे कलाओं के द्वारा बालचन्द्रको पूर्ण किया जाता है उसी प्रकार बलवान् राजाने उस सुन्दर पुत्रको अनेक स्त्रियोंसे पूर्ण किया था अर्थात् उसका अनेक स्त्रियोंके साथ विवाह किया था ।। १४० ॥ जिस प्रकार सूर्यके किरणें उत्पन्न होती हैं उसी प्रकार उसकी सोमप्रभा आदि रानियोंके सुवर्णनाभ आदि शुभ पुत्र उत्पन्न हुए ॥ १४१ ।। इस प्रकार पुत्र-पौत्रादिसे घिरे हुए श्रीमान् और बुद्धिमान् राजा कनकप्रभ सुखसे अपने राज्यका पालन करते थे। १४२ ।। किसी दिन उन्होंने मनोहर नामक वनमें पधारे हुए श्रीधर नामक जिन राजसे धर्मका स्वरूप सुनकर अपना राज्य पुत्रके लिए दे दिया तथा संयम धारण कर क्रम-क्रमसे निर्वाण प्राप्त कर लिया ॥ १४३॥ पद्मनाभने भी उन्हीं जिनराजके समीप श्रावकके व्रत लिये तथा मन्त्रियों के साथ स्वराष्ट्र १ विनीतः ख० । २ तमविक्रियः ल०। ३ भद्राङ्गजं क०, ग०, घ० । ४ विनेता वा क०, ख., ग०, घ०। ५ तमूर्जी वा ग०। ६ भाजनम् ग० । ७ 'तन्त्रः स्वराष्ट्रचिन्तायामावापः परचिन्तनम्। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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