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________________ चतुःपञ्चाशत्तम पर्षे इति तस्मिन् महीं पाति सौराज्ये सति भूपतौ । प्रजाः प्रजापतिं मत्वा तमैधन्त सुमेधसम् ॥ ११७॥ रत्नानि निधयश्चास्य चतुर्दश नवाभवत् । नवयौवनसम्प्राप्तौ प्राप्तपुण्योदयात् प्रभोः ॥१८॥ भाजनं भोजनं शय्या चमूर्वाहनमासनम् । निधीरत्नं पुरूं नाव्यमिति भोगान्दशान्वभूत् ॥ ११९॥ श्रद्धादिगुणसम्पन्नः स कदाचिन्महीपतिः। अरिन्दमाय दत्वानं सते मासोपवासिने ॥ १२०॥ गृहीतनवपुण्यात्मा वसुधारादिपञ्चकम् । प्रापाश्चर्यमनाप्यं किं सदनुष्ठानतत्परैः ॥ १२ ॥ असौ मनोहरोद्याने गुणप्रभजिनेश्वरम् । परेयुः प्राप्य तत्प्रोक्तं धर्मसारं रसायनम् ॥ १२२ ॥ पीत्वा 'स्वभवसम्बन्धश्रुतिबन्धुप्रचोदितः । सद्यो निविंद्य साम्राज्यं वितीर्य जितशत्रवे ॥ १२३ ॥ त्रैलोक्यजयिनं जेतु मोहराज कृतोद्यमः। 3राजभिर्बहुभिः सार्धं गृहीत्वा साधनं तपः ॥ १२४ ॥ चरित्वा निरतीचारं तनुं त्यक्त्वायुषोऽवधौ । नभस्तिलकगिर्यग्रे शान्तकारविमानगः ॥ १२५ ॥ अच्युतेन्द्रोऽजनिष्टाप्तवादिद्वाविंशतिस्थितिः । हस्तत्रयप्रमाणात निर्धातुतनुभास्करः ॥ १२६ ॥ शुक्ललेश्यः श्वसन्मासैरेकादशभिराहरन् । द्वाविंशतिसहस्राब्दैर्मनसाऽऽहारमामरम् ॥ १२७ ॥ तमःप्रभावधिव्याप्तदेशावधिविलोचनः । तत्क्षेत्रव्यापिसत्तेजोबलोत्तरशरीरभाक ॥ १२८॥ दिव्यभोगांश्चिरं भुक्त्वा स्वायुरन्ते विशुद्धृहक । “प्राग्भागधातकीखण्डे सीतादक्षिणकूलगे ॥ १२९ ॥ विषये मङ्गलावत्यां रत्नसञ्चयपूरपतिः । देव्यां कनकमालायां वल्लभः कनकप्रभः ॥१३॥ न कोई तादात्विक था-भविष्यत्का विचार न रख वर्तमानमें ही मौज उड़ानेवाला था, किन्तु सभी समीचीन कार्यों में खर्च करनेवाले थे ।। ११६ । इस प्रकार जब वह राजा पृथिवीका पालन करता था तब सब ओर सुराज्य हो रहा था और प्रजा उस बुद्धिमान् राजाको ब्रह्मा मानकर वृद्धिको प्राप्त हो रही थी ।। ११७ ।। जब नव यौवन प्राप्त हुआ तब उस राजाके पूर्वोपार्जित पुण्य कर्मके उदयसे चौदह रत्न और नौ निधियाँ प्रकट हुई थीं ॥ ११८ ।। भाजन, भोजन, शय्या, सेना, सवारी, आसन, निधि, रत्न, नगर और नाट्य इन दश भोगोंका वह अनुभव करता था ।। ११६ ॥ श्रद्धा आदि गुणोंसे संपन्न उस राजाने किसी समय एक माहका उपवास करनेवाले अरिन्दम नामक साधुके लिए आहार-दान देकर नवीन पुण्यका बन्ध किया तथा रत्न-वृष्टि आदि पश्चाश्चर्य प्राप्त किये सो ठीक ही है क्योंकि उत्तम कार्योंके करनेमें तत्पर रहनेवाले मनुष्योंको क्या दुर्लभ है ? ॥ १२०-१२१ ॥ दूसरे दिन वह राजा, गुप्तप्रभ जिनेन्द्रकी वन्दना करनेके लिए मनोहर नामक उद्यानमें गया । वहाँ उसने जिनेन्द्र भगवान्के द्वारा कहे हुए श्रेष्ठ धर्म रूपी रसायनका पान किया, अपने पूर्व भवके सम्बन्ध सुने, जिनसे भाईके समान प्रेरित हो शीघ्र ही वैराग्य प्राप्त कर लिया। वह जितशत्रु नामक पुत्रके लिए राज्य देकर त्रैलोक्यविजयी मोह राजाको जीतनेके लिए तत्पर हो गया तथा बहुतसे राजाओंके साथ उसने तप धारण कर लिया। इस प्रकार निरतिचार तप तप कर आयुके अन्तमें वह नभस्तिलक नामक पर्वतके अग्रभाग पर शरीर छोड़ सोलहवें स्वर्गके शान्तकार विमानमें अच्युतेन्द्र हुआ। वहाँ उसकी बाईस सागरकी आयु थी, तीन हाथ ऊँचा तथा धातु-उपधातुओंसे रहित देदीप्यमान शरीर था, शुक्ललेश्या थी, वह ग्यारह माहमें एक बार श्वास लेता था, बाईस हजार वर्षे बाद एक बार अमृतमयी मानसिक आहार लेता था, उसके देशावधिज्ञान-रूपी नेत्र छठवीं पृथिवी तकके पदार्थों तकको देखते थे, उसका समीचीन तेज, बल तथा वैक्रियिक शरीर भी छठवीं पृथिवी तक व्याप्त हो सकता था ॥ १२२-१२८॥ इस प्रकार निमेल सम्यग्दर्शनको धारण करनेवाल वह अच्युतेन्द्र चिरकाल तक स्वर्गकेसुख भोगायुके अन्तमें कहाँ उत्पन्न हुआ यह कहते हैं ॥१२६॥ पूर्व धातकीखण्ड द्वीपमें सीता नदीके दाहिने तट पर एक मङ्गलावती नामका देश था । उसके रत्नसंचय नगरमें कनकप्रभ राजा राज्य करते थे। उनकी कनकमाला नामकी रानी थी। वह अहमिन्द्र उन दोनों दम्पतियोंके शुभ स्वप्नों द्वारा अपनी सूचना देता हुआ पद्मनाभ नामका पुत्र १ जिनेशितम् ल०। २ स्वभाव क०, प० । स्वभवः ख०, ग०, ल०। ३ रामाभिः ल । मनिसाहार -क०,ख०, घ०।५प्राग्भागे ल०।६ रखसंचयभूपतिः ख०। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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