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________________ १५५ षट्सप्ततितमं पर्व निश्चयव्यवहारास्मसारनिर्वाणसाधनम् । त्रिरूपमोक्षसन्मार्गभावनं तद्वलोदयात् ॥ ३८७ ॥ निहत्य घातिकर्माणि प्राप्यानन्तचतुष्टयम् । अघातीनि च विध्वस्य पारमात्म्यं प्रयास्यति ॥ ३८८ ॥ इति श्रीमद्गणाधीशनिदेशान्मगधेश्वरः । प्रीतवानभिवन्द्यायान्मन्वानः स्वकृतार्थताम् ॥ ३८९ ॥ अथान्यदा महाराजः श्रेणिकः क्षायिकी दृशम् । दधनत्वा गणाधीश कुडमलीकृतहस्तकः ॥ ३९०॥ शेषावसर्पिणीकालस्थिति निरवशेषतः । आगाम्युल्सपिणीकालस्थितिमप्यनुयुक्तवान् ॥ ३९ ॥ गणी निजद्विजाभीषुप्रसरैः प्रीणयन् सभाम् । गिरा गम्भीरया व्यक्तमुक्तवानिति स क्रमात् ॥ ३९ ॥ चतुर्थकालपर्यन्ते स्थिते संवत्सरत्रये । साष्टमासे सपने स्यात्सिद्धः सिद्धार्थनन्दनः ॥ ३९३ ॥ दुषमायाः स्थितिवर्षसहस्राण्येकविंशतिः। शतवर्षायुषस्तस्मिन्रनुकृष्टेन मता नराः ॥ ३९ ॥ सहारस्निप्रमाणाङ्गा रूक्षच्छाया विरूपकाः । त्रिकालाहारनिरताः सुरतासकमानसाः ॥ ३९५ ॥ परेऽपि दोषाः प्रायेण तेषां स्युः कालदोषतः। यतोऽस्यां पापकर्माणो जनिष्यन्ते सहस्रशः ॥ ३१६॥ यथोकभूभुजाभावाज्जाते वर्णादिसङ्करे । दुषमायां सहस्राब्दव्यतीतो धर्महानितः ॥ ३९७ ॥ पुरे पाटलिपुत्राख्ये शिशुपालमहीपतेः । पापी तनूजः पृथिवीसुन्दयाँ दुर्जनादिमः ॥ ३५८ ॥ चतुर्मुखाइयः कल्किराजो वेजितभूतलः । उत्पत्स्यते माघसंवत्सरयोगसमागमे ॥ ३९९ ॥ समानां सप्ततिस्तस्य परमायुः प्रकीर्तितम् । चत्वारिंशसमा राज्यस्थितिश्चाक्रमकारिणः ॥ ४.०॥ पण्णवस्युक्तपापण्डिवर्गस्याज्ञाविधायिनः । निजभृत्यत्वमापाच महीं कृत्वा स भोक्ष्यति ॥ ४०॥ अथान्येचः स्वमिथ्यात्वपाकाविष्कृतचेतसा। पाषाण्डषु किमस्माकं सन्स्यत्राज्ञापराङ्मुखाः ॥७०२॥ महावीर स्वामीके पास आकर संयम धारण किया है।३८५-३८६॥ निश्चय और व्यवहार रूप मोक्षका साधन, सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र रूप मोक्षमार्गकी भावना ही है। सोइसके बलसे ये प्रीतिकर मुनिराज घातिया कोको नष्ट कर अनन्तचतुष्टय प्राप्त करेंगे और फिर अघातिया कर्मों को नष्ट कर परमात्मपद प्राप्त करेंगे ॥ ३८७-३८८ ।। इस प्रकार श्रीमान् गणधरदेवकी कही कथासे राजा श्रेणिक बहुत ही प्रसन्न हुआ तथा उन्हें नमस्कार कर अपने आपको कृतार्थ मानता हुआ नगरमें चला गया ।।३८६ अथानन्तर किसी दूसरे दिन क्षायिक सम्यग्दर्शनको धारण करनेवाले राजा श्रेणिकने हाथ जोड़कर गणधरदेवको नमस्कार किया तथा उनसे बाकी बची हुई अपसर्पिणी कालकी स्थिति और आनेवाले उत्सपिणी कालकी समस्त स्थिति पूछी।। ३६०-३६१|| तब गणधर भगवान् अपने दाँतोंकी किरणोंके प्रसारसे सभाको संतुष्ट करते हुए गम्भीर-वाणी द्वारा इस प्रकार अनुक्रमसे स्पष्ट कहने लगे ॥ ३६२ ॥ उन्होंने कहा कि जब चतुर्थ कालके अन्तके तीन वर्ष साढ़े आठ माह बाकी रह जावेंगे तब भगवान महावीर स्वामी सिद्ध होंगे ।। ३६३॥ दुःषमा नामक पश्चम कालकी स्थिति इक्कीस हजार सागर वर्षकी है। उस कालमें मनुष्य उत्कृष्ट रूपसे सौ वर्षकी आयुके धारक होंगे ॥ ३६४॥ उनका शरीर अधिकसे अधिक सात हाथ ऊँचा होगा, उनकी कान्ति रूक्ष हो जायगी, रूप भद्दा होगा, वे तीनों समय भोजनमें लीन रहेंगे और उनके मन काम-सेवनमें आसक्त रहेंगे ।। ३६५ ॥ कालदोषके अनुसार उनमें प्रायः और भी अनेक दोष त्पन्न होंगे क्योंकि पाप करनेवाले हजारों मनुष्य ही उस समय उत्पन्न होंगे ॥३६६ ।। शास्त्रोक्त लक्षणवाले राजाओंका अभाव होनेसे लोग वर्णसंकर हो जायेंगे। उस दुःषमा कालके एक हजार वर्ष बीत जानेपर धर्मकी हानि होनेसे पाटलिपुत्र नामक नगरमें राजा शिशुपालकी रानी पृथिवीसुन्दरीके चतुर्मुख नामका एक ऐसा पापी पुत्र होगा जो कि दुर्जनोंमें प्रथम संख्याका होगा, पृथिवीको कम्पायमान करेगा और कल्कि राजाके नामसे प्रसिद्ध होगा। यह कल्कि मघा नामके संवत्सरमें होगा ॥ ३६७-३६६॥ आक्रमण करनेवाले उस कल्किकी उत्कृष्ट आयु सत्तर वर्षकी होगी और उसका राज्यकाल चालीस वर्ष तक रहेगा ।। ४०० ॥ पाषण्डी साधुओंके जो छियानवे वर्ग हैं उन सबको वह आज्ञाकारी बनाकर अपना सेवक बना लेगा और इस तरह समस्त पृथिवीका उपभोग करेगा ॥४०१ ।। तदनन्तर मिथ्यात्वके उदयसे जिसका चित्त भर रहा है ऐसा पापी कल्कि अपने मन्त्रियोंसे पूछेगा कि कहो इन पाषण्डी साधुओंमें अब भी क्या कोई ऐसे हैं जो हमारी Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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