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________________ षट्सप्ततितमं पर्व स्थापयित्वा समारुह्य स्वगलोखरजनकः । उदन्धनक्रम तस्या दर्शयन् मृत्युचोदितः ॥ ११ ॥ मृदा पतिते भूमौ सद्यः केनापि हेतुना । रजपाताविलीभूतकण्ठः प्रोद्वत्रलोचनः ॥ १२ ॥ प्रापत्प्रेताधिवासं तवीक्ष्यासौ दुर्मुतेर्भयात् । आयागहमतस्तद्वल्लोभो हेयो महांस्त्वया ॥ ९३ ॥ इत्यस्य सोऽपि वाग्जालमसोढोदाहरिष्यति । किल धूर्तविटं वीक्ष्य ललिताङ्गाभिधामकम् ॥ ९ ॥ कस्यचिरसा महादेवी जाता मदनविह्वला । तद्विटानयनोपायनिरन्तरनियुक्तया ॥ ९५॥ तद्धाच्या गुप्तमानीतः पथिकोऽन्तः प्रवेशितः। सह तेन महादेवी रममाणा यथेप्सितम् ॥ १६ ॥ अहोभिर्बहुभिाता शुद्धः शुद्धान्तरक्षिभिः । तन्मुखाशदुराचारे राज्ञापि विदिते सति ॥ ॥ ९७ ॥ जारापनयनोपायमाज्ञप्ताः 'परिचारिकाः । अवस्करगृहं नीत्वा सा तं तत्राक्षिपन्खलम् ॥ १८ ॥ स दुर्गन्धेन तजन्तुभिश्च दुःखमवाप्नुवन् । अत्रैव नरकावासमाप्तवान् पापपाकतः ॥ ९ ॥ तद्वदल्पसुखस्याभिलाषिणो नरकादिषु । भवन्ति दुस्तरापारधोरदुःखा गतिष्विति ॥ १० ॥ पुनः कुमार एवैकं प्रपञ्चाद्गदिता स तम् । येन संसारनिर्वगो जायते सहसा ४सताम् ॥ १० ॥ भाम्यन्संसारकान्तारे मृत्युमत्तद्विपेशिना । रुषा जिघांसुना जन्तुरनुपातोऽतिभीलुकः ॥ १०२ ॥ पलायमानो मानुष्यभूरुहान्तहितारमकः । तन्मूले कुलगोत्रादिनानावल्लीसमाकुले ॥ १०३ ॥ जन्मकूपे पतिरवायुर्वल्लीलग्नशरीरकः । सितासितादिनानेकमूषकोच्छेद्यतल्लकः ॥ १०४ ॥ नरकग्यारवक्त्रोरुसर्पसप्तकसनिधिः । तद्भजेष्टार्थसूनोत्थसौख्यक्षौदरसोत्सुकः ॥ १०५ ॥ पापी मृत्युसे प्रेरित हो वहाँसे आ निकला। वह उस स्त्रीके आभूषण लेना चाहता था इसलिए वृक्षके नीचे अपना मृदङ्ग रखकर तथा उसपर चढ़कर अपने गलेमें फाँसीकी रस्सी बाँध उसे मरनेकी रीति दिखलाने लगा। उसने अपने गलेमें रस्सी बाँधी ही थी कि किसी कारणसे नीचेका मृदङ्ग जमीन पर लुढ़क गया। फाँसी लग जानेसे उसका गला फँस गया और आँखें निकल आई। इस प्रकार वह मरकर यमराजके घर गया। उसका मरण देख वह स्त्री उस दुःखदायी मरणसे डर गई और अपने घर वापिस आ गई। कहनेका अभिप्राय यह है कि आपको उस मृदङ्ग बजानेवालेके समान बहुत भारी लोभ नहीं करना चाहिये ॥६०-६३ । इस प्रकार उस चोरका वाग्जाल जम्बूकुमार सहन नहीं कर सकेगा अतः उत्तरमें दूसरी कथा कहेगा। वह कहेगा कि ललिताङ्ग नामके किसी धूर्त व्यभिचारी मनुष्यको देखकर किसी राजाकी रानी कामसे विह्वल हो गई। उसने किसी भी उपायसे उस पथिकका लानेके लिए एक धाय नियुक्त की और धाय भी उसे गुप्त रूपसे महलके भीतर ले गई। महारानी उसके साथ इच्छानुसार रमण करने लगी। बहुत समय बाद अन्तःपुरकी रक्षा करनेवाले शुद्ध खोजा लोगोंने रानीकी यह बात जान ली और उनके कहनेसे राजाको भी रानीके इस दुराचारका पता लग गया ।। ६४-६७ ॥ राजाने इस दुराचारकी बात जानकर किसी भी उपायसे उस जारको पकड़नेके लिए सेवकोंको आज्ञा दी। यह जानकर रानीने उसे टट्टीमें ले जाकर छिपा दिया। वहाँकी दुर्गन्ध और कीड़ोंसे वह वहाँ बहुत दुःखी हुआ तथा पाप कर्मके उदयसे इसी जन्ममें नरक वासके दुःख भोगने लगा ।। ६८-६६ ॥ इसी प्रकार थोड़े सुखकी इच्छा करनेवाले पुरुष नरकमें पड़ते हैं और वहाँ के दुस्तर, अपार तथा भयंकर दुःख उठाते हैं । १०० ॥ इसके बाद भी वह एक ऐसी कथा और कहेगा जिसके कि द्वारा सत्पुरुषोंको संसारसे शीघ्र ही निवंग हो जाता है। १०१॥ वह कहेगा कि एक जीव संसार रूपी वनमें घूम रहा था। एक मदोन्मत्त हाथी क्रोधवश उसे मारनेकी इच्छासे उसके पीछे-पीछे दौड़ा। वह जीव भयसे भागता-भागता मनुष्य रूपी वृक्षकी बाड़में छिप गया। उस वृक्षके नीचे कुल, गोत्र आदि नाना प्रकारकी लताओंसे भरा हुआ एक जन्म रूपी कुआँ था। वह जीव उस जन्मरूपी कुएँ में गिर पड़ा परन्तु आयुरूपी लतामें उसका शरीर उलझ गया जिससे नीचे नहीं जा सका। वह आयुरूपी लताको शुक्लपक्ष और कृष्णपक्षके दिनरूपी अनेक चूहे कुतर रहे थे। सातों नरकरूपी सर्प ऊपरकी ओर मुंह खोले उसके गिरनेकी प्रतीक्षा १पथिकान्तप्रदेशिना ल.(१)। २ परिचायकाः ल०। ३-मवाप्नुयात् ग०। ४ सतम् ल.। ५सन्निधिमूल। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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