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________________ महापुराणे उत्तरपुराणम् तत्र तचेटिकामेकामाहूय स्वामिनीं निजाम् । शापयेति स्थितः कश्चिद्विप्रो द्वारीव्यवबुधत् ॥ १०२ ॥ सापि स्वस्वामिनीमेतद्विप्रप्रोक्तमबोधयत् । ततः स्वानुमतायातं वृद्धविप्रं यथोचितम् ॥ ६०३ ॥ प्रतिगृह्य कुतो वेतो गमिष्यसि कुतोऽथवा । इति तस्याः परिप्रक्षे पश्चादिह समागतः ॥ ६०४ ॥ पुनः पुरो गमिष्यामीत्याहासौ तच्छ्रतेर्जनः । पार्श्ववर्ती व्यधाद्धासं दारिकाया द्विजोऽपि तम् ॥ ६०५ ।। न हास्यं कुरुतैवं भ वार्धक्यं विपरीतताम् । उत्पादयति युष्माकं किं न भावीति सोऽवदत् ॥। ६०६ ।। पुनः पुरः क गन्तव्यमिति तत्प्रत्युदीरणे । कन्यातीर्थ परिप्राप्तेर्यावद्यावद्गतिर्मम ॥ ६०७ ॥ इति द्विजोदितं श्रुत्वा कायेन वयसाप्ययम् । वृद्धो न चेतसेत्येवं नर्मप्रायोक्तिपूर्वकम् ॥ ६०८ ॥ अग्रासने विधायैनं स्वयमभ्यवहृत्य सा । इदानीं भवतो यत्र वान्छा तनाशु गम्यताम् ॥ ६०९ ॥ इत्याह सोsपि सुक्तं त्वया भद्रे ममेति ताम् । प्रशंसन् प्रस्खलन् कृच्छ्रादुत्थायालय यष्टिकाम् ॥ ६१० ॥ तदीयशयनारोहं व्यधादुक्त इवैतया । पेटिकास्तद्विलोक्यास्य पश्य निर्लज्जतामिति ॥ ६११ ॥ हस्तावलम्बनेनैनं निराकर्तुं समुद्यताः । युष्माभिः सम्यगेवोक्तं लज्जा स्त्रीविषयैव सा ॥ ६१२ ॥ न पुंसु यदि तत्रास्ति लज्जा साधारणी भवेत् । ततः स्त्रीभिः कथं पुंसां सङ्गमोऽनङ्ग संस्कृतः ॥ ६१३ ॥ इति बुद्धोतिमाकर्ण्य ब्राह्मणोऽयं न केवलः । कोऽपि रूपपरावृत्तिविद्यया समुपागतः ॥ ६१४ ॥ इस्याकलय्य को दोषो विप्रः प्राघूर्णिको मम । तिष्ठत्वत्रेति तटिका निवारयति स्म सा ॥ ६१५ ॥ तनिशावसितौ शुद्धदेशजस्वरभेदवित् । गीतवान्मधुरं वृद्धश्विरं श्रोत्रमनोहरम् ॥ ६१६ ॥ गन्धर्वदशा कल्याणकाले सालक्रिय कलम् । जीवन्धरकुमारस्य गीतं वैतच्छूतेः सुखम् ॥ ६१७ ॥ घरकी ओर चल पड़ा। वहाँ जाकर तथा एक दासीको बुलाकर उसने कहा कि तुम अपनी मालकिन से कहो कि द्वार पर कोई ब्राह्मण खड़ा है ।। ६०० - ६०२ ।। दासीने भी अपनी मालकिनको ब्राह्मणकी कही हुई बात समझा दी । गुणमालाने अपनी अनुमतिसे आये हुए उस वृद्ध ब्राह्मणका यथायोग्य सत्कार कर पूछा कि 'आप कहाँ से आये हैं और यहाँ से कहाँ जायेंगे ? गुणमाला के इस प्रश्नके उत्तरमें उसने कहा कि 'यहाँ पीछेसे आया हूँ और आगे जाऊँगा । ब्राह्मणकी बात सुनकर कन्या गुणमालाके समीपवर्ती लोग हँसने लगे। यह देख, ब्राह्मणने भी उनसे कहा कि इस तरह आप लोग हँसी न करें बुढ़ापा विपरीतता उत्पन्न कर देता है, क्या आप लोगोंका भी बुढ़ापा नहीं आवेगा ? ।। ६०३-६०६ ॥ तदनन्तर उन लोगोंने फिर पूछा कि आप आगे कहाँ जायेंगे ? ब्राह्मणने कहा कि जबतक कन्या तीर्थकी प्राप्ति नहीं हो जावेगी तबतक मेरा गमन होता रहेगा || ६०७ ॥ इस प्रकार ब्राह्मणका कहा उत्तर सुनकर सबने हँसते हुए कहा कि यह शरीर और अवस्थासे बूढ़ा है, मनसे बूढ़ा नहीं है । तदनन्तर गुणमालाने उसे श्रम आसन पर बैठाकर स्वयं भोजन कराया और फिर कहा कि अब आपकी जहाँ इच्छा हो वहाँ शीघ्र ही जाइये ।। ६०८ - ६०६ ।। इसके उत्तर में ब्राह्मणने कहा कि 'हे भद्र! तूने ठीक कहा' इस तरह उसकी प्रशंसा करता और डगमगाता हुआ वह ब्राह्मण लाठी टेक कर बड़ी कठिनाईसे उठा और उसकी शय्यापर इस प्रकार चढ़ गया मानो उसने इसे चढ़नेकी आशा ही दे दी हो। यह देख, दासियाँ कहने लगीं कि इसकी निर्लज्जता देखो । वे हाथ पकड़ कर | उसे शय्यासे दूर करनेके लिए उद्यत हो गई । तब ब्राह्मणने कहा कि आप लोगोंने ठीक ही तो कहा है, यथार्थमें लज्जा स्त्रियों में ही होती है पुरुषों में नहीं, यदि उनमें भी स्त्रियोंके समान ही लज्जा होने लगे तो फिर स्त्रियों के साथ कामसे संस्कृत किया हुआ उनका समागम कैसे हो सकता है ? ।। ६१०६१३ || इस प्रकार वृद्ध ब्राह्मणकी बात सुनकर गुणमालाने विचार किया कि यह केवल ब्राह्मण ही नहीं है किन्तु रूपपरावर्तनी विद्याके द्वारा रूप बदल कर कोई अन्य पुरुष यहाँ आया है । ऐसा विचार कर उसने दासियोंको रोक दिया और उस ब्राह्मण से कहा कि क्या दोष है ? आप मेरे पाहुने हैं अतः इस शय्यापर बैठिये ।। ६१४-६१५ ।। रात्रि समाप्त होनेपर शुद्ध तथा देशज स्वरके भेदोंको जाननेवाले उस वृद्ध ब्राह्मणने चिरकाल तक श्रोत्र तथा मनको हरण करनेवाले मधुर गीत गाये । गन्धर्वदत्ताके विवाह के समय जीवन्धर कुमारने जो अलंकार सहित मनोहर गीत गाये थे उन्हें सुन १ कुतस्त्यस्त्वं ल० । २ दारिकायां ल० । ३ पुनः इति क्वचित् । ४ मामुपागतः ल० । १२२ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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