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________________ पञ्चसप्ततितम् पर्व ५२१ वणिगादेशनिर्दिष्टो दैवज्ञैरयमित्यसौ । दत्तवान्विमलां तस्मै सुता 'स्वा कमलोद्भवाम् ॥ ५८७ ॥ दिनानि कानिचित्तत्र संवसन् सुखमन्यदा । परिव्राजकवेषेण काष्ठाङ्गारिकसंसदम् ॥ ५८८ ॥ प्रविश्य तं समालोक्य कृताशीर्वादसक्रियः । शृणु राजमहं भोक्तुं याचे स्वामतिथिर्गुणी ॥ ५८९ ॥ मां भोजयेत्युवाचैतच्छ्रुत्वा सम्प्रतिपक्षवान् । मदुयोगफलम्यैतनिमित्तं कुसुमं परम् ॥ ५९० ॥ इत्यग्रासनमास्थाय भुक्त्वा तस्मात्स निर्गतः । वशीकरणचूर्णादिप्रत्यक्षफलमौषधम् ॥ ५९१ ॥ मत्करे विद्यते यस्मै रुचिहात्वसाविदम् । इति राजकमभ्येत्य पृथक्पृथगघोषयत् ॥ ५९२ ।। तच्छ्रुत्वा पश्य नैर्लज्ज्यमस्य वार्धक्यमीहशम् । वशीकरणचूर्णाअनादिबन्धनमप्यदः ॥ ५९३ ॥ इति तद्वचनात्सर्वैः कृत्वा हासं द्विजोत्तम । कन्यका गुणमालाख्या पुरेऽस्मिन्नस्ति विश्रुता ॥ ५९४ ।। जीवन्धरेण मर्णवासस्य न कता स्तुतिः । इति नृद्वेषिणी जाता तो स्वचूर्णाअनादिभिः ॥५९५ ॥ वशीकुरुष्व तद्वीक्ष्य तव मन्त्रौषधादिकम् । मौल्येन बहुना सर्वमाददिष्यामहे वयम् ॥ ५९६ ॥ इत्युक्तस्तैः सकोपो वा युष्मजीवन्धरो विधीः । चूर्णवासादिभेदं किं स जानाति परीक्षितुम् ॥ ५९७ ॥ इत्युक्तवांस्ततः सर्वे सकोपा विप्रमब्रवन् । यथेष्टं किं ब्रवीच्येवं नृसारमविवेचयन् ॥ ५९८ ॥ आत्मस्तवोऽन्यनिन्दा च मरणान्न विशिष्यते । इति लोकप्रसिद्ध किं न श्रुतं दुःश्रुतोद्धत ॥ ५९९ ॥ इत्यसो तैरधिक्षिप्तः किं न सन्ति प्रशंसकाः। युष्मद्विधा ममापीति सम्भाब्यात्मानमुद्धतः ॥ ६.०॥ घटदासी विधास्यामि गुणमाला मुहूर्ततः । ममेति सारं कृत्वा प्रस्थितस्तद्रहं प्रति ॥ ६०१॥ पुरुष है, ऐसा विचार कर उसने अपनी स्त्री कमलासे उत्पन्न हुई विमला नामकी पुत्री उन्हें समर्पित कर दी ॥५८६-५८७ । विवाहके बाद जीवन्धर कुमार कुछ दिन तक सागरदत्त सेठके यहाँ सुखसे रहे। तदनुसार किसी अन्य समय परिव्राजकका वेष रखकर काष्ठाङ्गारिककी सभामें गये। वहाँ प्रवेश कर तथा काष्ठाङ्गारको देखकर उन्होंने आशीर्वाद देते हुए कहा कि 'हे राजन् ! सुनो, मैं एक गुणवान् अतिथि हूँ, तुझसे भोजन चाहता हूँ, मुझे खिला दे। यह सुकर काष्ठाङ्गारिकने उसे भोजन कराना स्वीकृत कर लिया। 'यह निमित्त, मेरे उद्योग रूपी फलको उत्पन्न करनेके लिए मानो फूल ही है। ऐसा विचार कर उन्होंने अगली आसन पर आरूढ़ होकर भोजन किया और भोजनोपरान्त वहाँसे चल दिया। तदनन्तर उन्होंने राजाओंके समूहमें जाकर अलग-अलग यह घोषणा कर दी कि 'मेरे हाथमें प्रत्यक्ष फल देनेवाला वशीकरण चूणे आदि उत्तम ओषधि है जिसकी इच्छा हो वह ले ले। उनकी यह घोषणा सुनकर सब लोग हँसी करते हुए कहने लगे कि देखो इसकी निर्लजता । इसका ऐसा तो बुढ़ापा है फिर भी वशीकरण चूर्ण, अञ्जन तथा बन्धक आदिकी औषधियाँ रखे हुए है। इस प्रकार कहते हुए उन लोगोंने हँसी कर कहा कि 'हे ब्राह्मण ! इस नगरमें एक गुणमाला नामकी प्रसिद्ध कन्या है। 'जीवन्धरने मेरे चूर्णकी सुगन्धिकी प्रशंसा नहीं की है। इसलिए वह पुरुष मात्रसे द्वेष रखने लगी है। तू अपने चूर्ण तथा अञ्जन आदिसे पहले उसे वशमें कर ले, बादमें यह देख हम सब लोग तेरे मन्त्र तथा औषधि आदिको बहुत भारी मूल्य देकर खरीद लेंगे। ॥५८८-५६६ ॥ इस प्रकार लोगोंके कहने पर वह ब्राह्मण क्रोधित-सा होकर कहने लगा कि तुम्हारा जीवन्धर मूर्ख होगा, वह चूर्गों की सुगन्धि आदिके भेदकी परीक्षा करना क्या जाने ॥५६७। इसके उत्तरमें सब लोग क्रोधित होकर उस ब्राह्मणसे कहने लगे कि 'जीवन्धर मनुष्योंमें श्रेष्ठ हैं। इसका विचार किये बिना ही तू उनके प्रति इच्छानुसार यह क्या बक रहा है ॥ ५६८ ॥ हे मिथ्याशास्त्रसे उद्दण्ड ! क्या तूने यह लोक-प्रसिद्ध कहावत नहीं सुनी है कि अपनी प्रशंसा और दूसरेकी निन्दामें मरणसे कुछ विशेषता (अंतर) नहीं हैं अर्थात् मरणके ही समान है १६॥ इस प्रकार उन लोगोंके द्वारा निन्दित हुआ ब्राह्मण कहने लगा कि तो क्या आप जैसे लोग मेरी भी प्रशंसा करनेवाले नहीं हैं ? 'मैं भी कोई पुरुष हूँ। इस तरह अपनी प्रशंसा कर उस उद्धत ब्राह्मणने प्रतिज्ञा की कि 'मैं क्षणभरमें गुणमालाको अपनी घटदासी बना लूँगा'। ऐसी प्रतिज्ञा कर बह गुणमालाके १ स्वाममलोद्भवाम् इति क्वचित् । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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