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________________ महापुराणे उत्तरपुराणम् पुण्यपापफलेनास्ति सम्बन्धो यदि देहिनाम् । मया कथमिवालम्बि मनुष्य भवसम्भवः ॥ ४५८ ॥ ततः पुर्ण्य न पापं वा यथेष्टं वर्तनं सुखम् । इति कृत्वानु निश्शङ्कं पापी हिंसादिपञ्चकम् ॥ ४५९ ॥ मांसाद्याहारसंसको वहारम्भपरिग्रहैः ' । अनुबद्धोऽपि बद्ध्वायुर्नारकं परमावधि ॥ ४६० ॥ तेन यास्यत्यसौ पृथ्वीं सप्तमीं घोरदुःखदाम् । शुभा चोप्रानुभागोत्थस्त्रीवेदोदय भाविता ॥ ४६१ ॥ प्रवृद्धरागमद्वेषपैशुन्यादिप्रदूषिता । गुणशीलसदाचारान् श्रुत्वालोक्य च कोपिनी ॥ ४६२ ॥ सङ्कुशेन सदाबद्धनरकायुस्तनुच्युतौ । तमःप्रभामहादुःखभागिनीयं भविष्यति ॥ ४६३ ॥ इति तद्वचनप्रान्ते प्रणिपत्य मुनीश्वरम् । कुमारोऽप्यभयोऽपृच्छत्स्वभवान्तरसन्ततिम् ॥ ४६४ ॥ तदनुग्रहबुद्धयैवमाहासौ भव्यवत्सलः । इतोऽभवत्तृतीयेऽत्र भवे भव्योऽपि सन्सुधीः # ॥ ४६५ ॥ कश्चिद्विप्रसुतो वेदाभ्यासहेतोः परिभ्रमन् । देशान्तराणि पाषण्डिदेवतातीर्थजातिभिः ।। ४६६ । लोकेन च विमुह्याकुली भूतस्तत्प्रशंसनम् । तदाचरितमप्युच्चैरनुतिष्ठनयेच्छया ।। ४६७ ।। केनचित्पथिकेनामा जैनेन पथि स व्रजन् । पाषाणराशिसंलक्ष्य भूताधिष्ठितभूरुहः ॥ ४६८ ॥ समीपं प्राप्य भक्तयातो दैवमेतदिति "मम् । परीत्य प्राणमद्दृष्ट्वा तच्चेष्टां श्रावकः स्मिती ॥ ४६९ ॥ तस्यावमतिविध्यर्थ तद्दुमादाचपल्लवैः । परिमृज्य स्वपादाक्तधूलिं ते पश्य देवता ।। ४७० ॥ नाहतानां विधाताय समर्थेत्यवदद्विजम् । विप्रेणानु तथैवास्तु को दोषस्तव देवताम् ॥ ४७१ ।। परिभूतिपदं नेष्याम्युपाध्यायस्त्वमत्र मे । इत्युक्तस्तेन तस्मात्स प्रदेशान्तरमाप्तवान् ।। ४७२ ॥ ।।४५४-४५७।। कि यदि पुण्य-पापके फलके साथ जीवोंका सम्बन्ध रहता है तो फिर मुझ जैसे पापीको मनुष्य-भव कैसे मिल गया ? इसलिए जान पड़ता है कि नपुण्य है और न पाप है - इच्छानुसार प्रवृत्ति करना ही सुख है। ऐसा विचारकर वह पापी निःशङ्क हो हिंसादि पाँचों पाप करने लगा है, मांस आदि खानेमें आसक्त हो गया है और बहुत आरम्भ तथा परिग्रहोंके कारण नरककी उत्कृष्ट आयुका बन्ध भी कर चुका है। अब वह मरकर भयंकर दुःख देनेवाली सातवीं पृथिवी में जावेगा। इसी प्रकार शुभा भी तीव्र अनुभागजन्य स्त्रीवेदके उदयसे युक्त है, अतिशय बढ़े हुए रागद्वेष पैशुन्य आदि दोषोंसे अत्यन्त दूषित हैं, गुण शील तथा सदाचारकी बात सुनकर और देखकर बहुत क्रोध करती है। निरन्तर संक्लेश परिणाम रखनेसे वह नरकायुका बन्ध कर चुकी है.. और शरीर छूटनेपर तमःप्रभा पृथिवी सम्बन्धी घोर दुःख भोगेगी ।। ४५८ - ४६३ ।। इस प्रकार गणधर के वचन समाप्त होनेपर अभयकुमारने उठकर उन्हें नमस्कार किया और अपने भवान्तरोंका समूह पूछा ।। ४६४ ॥ ४७४ भव्य जीवों पर स्नेह रखनेवाले गणधर भगवान्, अभय कुमारका उपकार करनेकी भावना से इस प्रकार कहने लगे कि तू इस भवसे तीसरे भवमें कोई ब्राह्मणका पुत्र था और भव्य होनेपर भी दुर्बुद्धि था । वह वेद पढ़नेके लिए अनेक देशों में घूमता फिरता था, पाषण्डिमूढता, देवमूढता, तीर्थमूढता, जातिमूढता और लोकमूढतासे मोहित हो व्याकुल रहता था, उन्हीं के द्वारा किये हुए कार्योंकी बहुत प्रशंसा करता था और पुण्य प्राप्तिकी इच्छा से उन्हींके द्वारा किये हुए कार्यों का स्वयं आचरण करता था ।। ४६५-४६७ ।। एक बार वह किसी जैनी पथिकके साथ मार्ग में कहीं जा रहा था । मार्ग में पत्थरोंके ढेरके समीप दिखाई देने वाला भूतों का निवासस्थान स्वरूप एक वृक्ष था । उसके समीप जाकर और उसे अपना देव समझकर ब्राह्मण-पुत्र ने उस वृक्षकी प्रदक्षिणा दी तथा उसे नमस्कार किया। उसकी इस चेष्टाको देखकर श्रावक हँसने लगा तथा उसका अनादर करने के लिए उसने उस वृक्ष के कुछ पत्ते तोड़कर उनसे अपने पैरोंकी धूलि झाड़ ली और ब्राह्मणसे कहा कि देख तेरा देवता जैनियों का कुछ भी विधात करने में समर्थ नहीं है । इसके उत्तर में ब्राह्मणने कहा कि अच्छा ऐसा ही सही, क्या दोष है ? मैं भी तुम्हारे देवताका तिरस्कार कर लूंगा, इस विषयमें तुम मेरे गुरु ही सही। इस प्रकार कहकर वे दोनों फिर साथ चलने लगे और किसी एक १ परिग्रहः ल० । २ अनुबद्धोऽस्ति ल० । ३ इतो भवात्तृतीयेऽत्र ल० । ४ कुधीः ल० । ५ द्रुतम् ल० । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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